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Sunday, 15 October 2017

रघुपति भगति सजीवनि मूरी


रघुपति भगति सजीवनि मूरी

रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।
(तुलसीदास कहते हैं कि रघुपति की भक्ति संजीवनी की जड़ की तरह है। यह भक्ति कंद या फल की भाँति सामने दिखाई देने वाली नहीं है। इसी कारण इसे आसानी से पाया नहीं जा सकता। इसे जमीन को खोदकर निकालना पड़ा है। जटिल और कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इसी कारण रघुपति की भक्ति सरल नहीं है, सभी के लिए सुलभ नहीं है। आखिर ऐसे दुर्लभ और जटिल आराध्य रघुपति कौन हैं? उनकी भक्ति, जो संजीवनी मूल या संजीवनी की जड़ की भाँति दुर्लभ और जटिल है, वह कैसी है, और उसे किस प्रकार पाया जा सकता है? उसे पाने के लिए कौन-से प्रयास करने पड़ते हैं और उसे पाने के लिए किस प्रकार की योग्यता की, किन-किन उपरणों की जरूरत पड़ती है? उसका विशद वर्णन बाबा तुलसी ने इस प्रसंग में किया है।)
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ।।
नाथ मोहिं निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी ।।1
हिंदी साहित्येतिहास में भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास की कीर्ति का अक्षय स्रोत श्रीरामचरितमानस है। युगदृष्टा, क्रांतिदर्शी और कालजयी कवि गोस्वामी तुलसीदास की यह कृति रामभक्ति का एक माध्यम-मात्र नहीं है, वरन् इसमें युगानुरूप चेतना के ऐसे तत्त्व विद्यामान हैं, जो भक्तिकालीन स्थितियों-परिस्थितियों से लगाकर वर्तमान तक अपनी प्रासंगिकता को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इसी कारण देश और काल की परिधि में मानस को नहीं बाँधा जा सकता है। जब प्रश्न साहित्य की सामर्थ्य का उठता है, और साहित्य की प्रासंगिकता-उपादेयता को देश-काल-परिस्थिति की कसौटी में परखने का यत्न होता है, तो मानस को सदैव और सर्वत्र खरा पाते हैं। यह अलग विषय है, कि आज की विकृत और कुत्सित मानसिकता ने मानस को जाति-धर्म-वर्ग के दायरे में बाँधकर इसके लोकमंगलकारी और लोककल्याणकारी पक्षों को विस्मृत कर दिया है।
श्रीरामचरितमानस का आकार वस्तुतः रामभक्त तुलसी की दास्यभक्ति भावना से पुष्ट होकर बनता है, किंतु मानस के प्रणयन में प्रारंभ से पूर्णता की ओर चलते हुए राम की कथा जैसे-जैसे अपने चरम पर पहुँचती है, वैसे-वैसे क्रमशः नीति-नियम और जीवन की व्यावहारिकताओं के पक्ष उद्घाटित होने लगते हैं। उत्तरकांड तक पहुँचते-पहुँचते हम उस धरातल पर उतरने लगते हैं, जहाँ रामभक्त तुलसी की लेखनी विशालकाय समाज को उसकी दिशाहीनता, पथभ्रष्टता और असहायता से मुक्त कराने के लिए छटपटाती प्रतीत होती है।
श्रीरामचरितमानस का उत्तरकांड इसी कारण अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। बालकांड से लगाकर लंकाकांड तक जिस मनोभूमि को वे खाद-पानी देकर, उर्वर बनाकर तैयार करते हैं, उसमें बीज बोने का कार्य उत्तरकांड में होता है। यहाँ वे स्वयं उपदेशक की भाँति उपदेश नहीं देते, वरन् संवाद शैली में अपनी बात को रखते हैं। वे उपदेशक, प्रचारक या गुरु के रूप में स्वयं को प्रस्तुत नहीं करते। वे नेपथ्य में रहकर अपनी बात को कहते हैं। उत्तरकांड में संवादों का एक क्रम है। रामकथा से निःसृत नवनीत को लोक तक संप्रेषित करने के क्रम में कागभुशुंडि और लोमश ऋषि का संवाद है, जहाँ सगुण और निर्गुण के मध्य श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता का द्वंद्व चर्चा में आता है। इस संवाद के माध्यम से बाबा तुलसी अत्यंत सरलता के साथ यह स्पष्ट करते हैं, कि माया से आच्छादित रहने वाला जड़ जीव ब्रह्म सदृश नहीं हो सकता।2 अतः सगुण रूप की आराधना और उससे मन के विकारों का शमन ही युगानुरूप, सर्वस्वीकार्य और सहज होगा।
इसके अगले क्रम में कागभुशुंडि और गरुड़ का संवाद आता है। लोमश ऋषि और कागभुशुंडि के मध्य संवाद का अगला चरण कागभुशुंडि और गरुड़ के संवाद में प्रत्यक्ष होता है, जहाँ गरुड़ कागभुशुंडि से निवेदन करते हैं, कि यदि आप मुझ पर कृपावान हैं, और मुझे अपना सेवक मानते हैं, तो कृपापूर्वक मेरे सात प्रश्नों के उत्तर दीजिए। गरुड़ जी प्रश्न करते हैं-
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब तें दुर्लभ कवन सरीरा ।।
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोइ संछेपहिं कहहु बिचारी ।।
संत असंत मरम तुम जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ।।
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ।।
मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ।।3
गरुड़ प्रश्न करते हैं कि हे नाथ! सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है। कौन सबसे बड़ा दुःख है। कौन सबसे बड़ा सुख है। साधु और असाधु जन का स्वभाव कैसा होता है। वेदों में बताया गया सबसे बड़ा पाप कौन-सा है। इसके बाद वे सातवें प्रश्न के संबंध में कहते हैं कि मानस रोग समझाकर बतलाएँ, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।
गरुड़ के प्रश्न के उत्तर में कागभुशुंडि कहते हैं कि मनुष्य का शरीर दुर्लभ और श्रेष्ठ है, क्योंकि इस शरीर के माध्यम से ही ज्ञान, वैराग्य, स्वर्ग, नरक, भक्ति आदि की प्राप्ति होती है।4 वे कहते हैं कि दरिद्र के समान संसार में कोई दुःख नहीं है और संतों (सज्जनों) के मिलन के समान कोई सुख नहीं है।5 मन, वाणी और कर्म से परोपकार करना ही संतों (साधुजनों) का स्वभाव होता है।6 किसी स्वार्थ के बिना, अकारण ही दूसरों का अपकार करने वाले दुष्ट जन होते हैं। वेदों में विदित अहिंसा ही परम धर्म और पुण्य है, और दूसरे की निंदा करने के समान कोई पाप नहीं होता है।7
गरुड़ के द्वारा पूछे गए सातवें प्रश्न का उत्तर अपेक्षाकृत विस्तार के साथ कागभुशुंडि द्वारा दिया जाता है। सातवें और अंतिम प्रश्न के उत्तर में प्रायः वे सभी कारण निहित हैं, जो अनेक प्रकार के दुःखों का कारण बनते हैं। इस कारण बाबा तुलसी मानस रोगों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह तें दुख पावहिं सब लोगा ।।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह तें पुनि उपजहिं बहु सूला ।।
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ।।
प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ।।8
कागभुशुंडि कहते हैं कि मानस रोगों के बारे में सुनिए, जिनके कारण सभी लोग दुःख पाते हैं। सारी मानसिक व्याधियों का मूल मोह है। इसके कारण ही अनेक प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। शरीर में विकार उत्पन्न करने वाले वात, कफ और पित्त की भाँति क्रमशः काम, अपार लोभ और क्रोध हैं। जिस प्रकार पित्त के बढ़ने से छाती में जलन होने लगती है, उसी प्रकार क्रोध भी जलाता है। यदि ये तीनों मनोविकार मिल जाएँ, तो कष्टकारी सन्निपात की भाँति रोग लग जाता है। अनेक प्रकार की विषय-वासना रूपी मनोकांक्षाएँ ही वे अनंत शूल हैं, जिनके नाम इतने ज्यादा हैं, कि उन सबको जानना भी बहुत कठिन है।
बाबा तुलसी इस प्रसंग में अनेक प्रकार के मानस रोगों, जैसे- ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, जलन, दुष्टता, मन की कुटिलता, अहंकार, दंभ, कपट, मद, मान, तृष्णा, मात्सर्य (डाह) और अविवेक आदि का वर्णन करते हैं और शारीरिक रोगों के साथ इनकी तुलना करते हुए इन मनोरोगों की विकरालता को स्पष्ट करते हैं।9
यहाँ मनोरोगों की तुलना शारीरिक व्याधियों से इस प्रकार और इतने सटीक ढंग से की गई है, कि किसी भी शारीरिक व्याधि की तीक्ष्णता और जटिलता से मनोरोग की तीक्ष्णता और जटिलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का रोग प्रत्यक्ष होता है और शरीर में परिलक्षित होने वाले उसके लक्षणों को देखकर जहाँ एक ओर उपचार की प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर व्याधिग्रस्त व्यक्ति को देखकर अन्य लोग उस रोग से बचने की सीख भी ले सकते हैं। सामान्यतः मनोरोग प्रत्यक्ष परिलक्षित नहीं होता, और मनोरोगी भी स्वयं को व्याधिग्रस्त नहीं मानता है। इस कारण से बाबा तुलसी ने मनोरोगों की तुलना शारीरिक रोगों से करके एकदम अलग तरीके से सीख देने का कार्य किया है।
कागभुशुंडि कहते हैं कि एक बीमारी-मात्र से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और यहाँ तो अनेक असाध्य रोग हैं। मनोरोगों के लिए नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान आदि अनेक औषधियाँ हैं, किंतु ये रोग इन औषधियों से भी नहीं जाते हैं।10 इस प्रकार संसार के सभी जीव रोगी हैं। शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग से दुःख की अधिकता हो जाती है। इन तमाम मानस रोगों को विरले ही जान पाते हैं। जानने के बाद ये रोग कुछ कम तो होते हैं, मगर विषय-वासना रूपी कुपथ्य पाकर ये साधारण मनुष्य तो क्या, मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो जाते हैं।11
मनोरोगों की विकरालता का वर्णन करने के उपरांत इन रोगों के उपचार का वर्णन भी होता है। कागभुशुंडि के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर भरोसा करते हुए विषयों की आशा को त्यागकर संयम का पालन करने पर श्रीराम की कृपा से ये समस्त मनोरोग नष्ट हो जाते हैं।12
रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।13
इन मनोरोगों के उपचार के लिए श्रीराम की भक्ति संजीवनी जड़ की तरह है। श्रीराम की भक्ति को श्रद्धा से युक्त बुद्धि के अनुपात में निश्चित मात्रा के साथ ग्रहण करके मनोरोगों का शमन किया जा सकता है। यहाँ तुलसीदास ने भक्ति, श्रद्धा और मति के निश्चित अनुपात का ऐसा वैज्ञानिक-तर्कसम्मत उल्लेख किया है, जिसे जान-समझकर अनेक लोगों ने मानस को अपने जीवन का आधार बनाया और मनोरोगों से मुक्त होकर जीवन को सुखद और सुंदर बनाया।
यहाँ पर श्रीराम की भक्ति से आशय कर्मकांडों को कठिन और कष्टप्रद तरीके से निभाने, पूजा-पद्धतियों का कड़ाई के साथ पालन करने और इतना सब करते हुए जीवन को जटिल बना लेने से नहीं है। इसी प्रकार श्रद्धा भी अंधश्रद्धा नहीं है। भक्ति और श्रद्धा को संयमित, नियंत्रित और सही दिशा में संचालित करने हेतु मति है। मति को नियंत्रित करने हेतु श्रद्धा और भक्ति है। इन तीनों के सही और संतुलित व्यवहार से श्रीराम का वह स्वरूप प्रकट होता है, जिसमें मर्यादा, नैतिकता और आदर्श है। जिसमें लिप्सा-लालसा नहीं, त्याग और समर्पण का भाव होता है। जिसमें विखंडन की नहीं, संगठन की; सबको साथ लेकर चलने की भावना निहित होती है। जिसमें सभी के लिए करुणा, दया, ममता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य जैसे उदात्त गुण परिलक्षित होते हैं। श्रद्धा, भक्ति और मति का संगठन जब श्रीराम के इस स्वरूप को जीवन में उतारने का माध्यम बन जाता है, तब असंख्य मनोरोग दूर हो जाते हैं। स्वयं का जीवन सुखद, सुंदर, सरल और सहज हो जाता है। जब अंतर्जगत में, मन में रामराज्य स्थापित हो जाता है, तब बाह्य जगत के संताप प्रभावित नहीं कर पाते हैं।
इसी भाव को लेकर, आत्मसात् करके विसंगतियों, विकृतियों और जीवन के संकटों से जूझने की सामर्थ्य अनगिनत लोगों को तुलसी के मानस से मिलती रही है। यह क्रम आज का नहीं, सैकड़ों वर्षों का है। यह क्रम देश की सीमाओं के भीतर का ही नहीं, वरन् देश से बाहर कभी गिरमिटिया मजदूर बनकर, तो कभी प्रवासी बनकर जाने वाले लोगों के लिए भी रहा है। सैकड़ों वर्षों से लगाकर वर्तमान तक अनेक देशों में रहने वाले लोगों के लिए तुलसी का मानस इसी कारण पथ-प्रदर्शक बनता है, सहारा बनता है। आज के जीवन की सबसे जटिल समस्या ऐसे मनोरोगों की है, मनोविकृतियों की है, जिनका उपचार अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के पास भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में तुलसीदास का मानस व्यक्ति से लगाकर समाज तक, सभी को सही दिशा दिखाने, जीवन को सन्मार्ग में चलाने की सीख देने की सामर्थ्य रखता है।
संदर्भ-
1. गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 7/1-2/121, पृ. 947,
2. वही, 7/111, पृ. 934,
3. वही, 7/3-7/121, पृ. 947,
4. वही, 7/9-10/121, पृ. 947,
5. वही, 7/13/121, पृ. 947,
6. वही, 7/14/121, पृ. 948,
7. वही, 7/22/121, पृ. 948,
8. वही, 7/28-32/121, पृ. 948,
9. वही, 7/33-37/121, पृ. 949,
10.        वही, 7/दोहा 1-2/121, पृ. 949,
11.        वही, 7/1-4/122, पृ. 949-950,
12.        वही, 7/5-6/122, पृ. 950,
13.  वही, 7/7/122, पृ. 950 
डॉ. राहुल मिश्र

(अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास के जबलपुर अधिवेशन- 2017 में प्रस्तुत एवं साहित्य परिक्रमा के 15वाँ वार्षिक अधिवेशन विशेषांक, अक्टूबर-दिसंबर, 2017 में प्रकाशित)

Friday, 2 June 2017

मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं




मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं

बुंदेलखंड का विंध्य अंचल अपने अतीत से ही अनेक पुरा-कथाओं और मिथकों का केंद्र रहा है। यहाँ कण-कण में ऐसी रोमांचकारी कथाएँ बसी हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्य में भी डाल देती हैं और अपने आकर्षण में जकड़ भी लेती हैं। बाँदा जनपद के कालंजर दुर्ग के माहात्म्य को जानने वाले इतना अवश्य जानते होंगे की शैव-साधना का यह केंद्र एक रात में ही बनकर तैयार हो गया था। देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा ने कालंजर के दुर्ग को एक रात में ही बना दिया था, ऐसी मान्यता है। कालंजर के साथ ही कालंजर के पूर्वोत्तर की ओर लगभग सोलह मील दूर मड़फा का दुर्ग भी उसी रात बनना शुरू हुआ था, जिस रात कालंजर का निर्माण हो रहा था। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जी ने पहले कालंजर का दुर्ग बनाया और उसके तैयार हो जाने के बाद मड़फा के दुर्ग को बनाने का काम शुरू किया। रात बीत गई और मड़फा दुर्ग के पूरी तरह से नहीं बन पाने के कारण यह अधूरा ही रह गया। और वास्तव में यह दुर्ग कभी पूरी तरह से नहीं बन पाया। लोक-जीवन में जीवित यह कथा आज भी मड़फा की वीरानियों में गूँजती है। मड़फा दुर्ग का यह अधूरापन आज भी महसूस किया जा सकता है। इसकी वीरानियों में गुलज़ार होने की कसक आज भी महसूस होती है और इसी कारण बरबस ही लगता है कि यदि यह दुर्ग अधूरा न होता, तो शायद कालंजर से भी सुंदर, मोहक और आकर्षक होता। छत्रपति शिवाजी महाराज के शिवनेरी दुर्ग की भाँति अगम्य ऊँचाई में बना यह दुर्ग इतना समर्थ होता, कि कभी कोई आक्रांता इसे जीत नहीं पाता। वैसे भी इस दुर्ग को अजेय ही कहा जा सकता है, क्योंकि सन् 1780 में छछरिहा के युद्ध के पहले तक इस दुर्ग को जीतने में कोई सफल नहीं हो सका था। पन्ना के बघेल राजा हरिवंश राय और बाँदा के नवाब के बीच हुए छछरिहा के संग्राम के बाद यह दुर्ग अपना अस्तित्व खोता गया।
ऐसी मान्यता है कि महर्षि अर्थवर्ण का आश्रम मड़फा में ही था। महर्षि महाअर्थवर्ण को अथर्वा के नाम से भी जाना जाता है और उनके कारण ही चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद को जाना जाता है। महर्षि अथर्वा की पहचान महर्षि वेदव्यास के श्वसुर के रूप में, और इसी कारण मड़फा को वेदव्यास की ससुराल के रूप में भी जानते हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘कृष्ण द्वैपायन व्यास’ में उल्लेख किया है कि एक बार महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती से मिलने के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान- ग्राम हस्तम, जनपद बाँदा) जा रहे थे। रास्ते में वाग्मती नदी (वर्तमान- बागे नदी, बदौसा, बाँदा) के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें पकड़कर मारपीट शुरू कर दी, जिस कारण वेदव्यास बेहोश हो गए। वहाँ से गुजरते हुए महाअर्थर्वण के शिष्यों ने महर्षि व्यास की दयनीय दशा को देखा और उन्हें उठाकर महाअर्थवर्ण के आश्रम में ले आए। महाअर्थवर्ण की पुत्री वाटिका ने बड़ी लगन के साथ महर्षि व्यास की सेवा-सुश्रुषा की। बाद में महर्षि व्यास ने वाटिका से विवाह कर लिया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे व्यासपुत्र सुखदेव के नाम से जाना जाता है।
अपनी जर्जर काया को आयुर्वेद की चिकित्सा के माध्यम से युवा कर लेने वाले महर्षि च्यवन का आश्रम भी मड़फा में था, ऐसी मान्यता है। चरक संहिता सहित आयुर्वेद की अनेक पुस्तकों के रचयिता और सुप्रसिद्ध वैद्य चरक ऋषि का आश्रम भी मड़फा में ही था। लोक-प्रचलित कथाओं और मिथकों का अनूठा संगम मड़फा में देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है कि माण्डव्य ऋषि के आश्रम से इस स्थान का नाम मड़फा पड़ा है। माण्डव्य ऋषि के आश्रम में कण्व ऋषि समेत अनेक ऋषि रहा करते थे। दुष्यंत और शकुंतला की पुरा-ऐतिहासिक गाथा के पुष्पन-पल्लवन का स्थान भी यही माना जाता है। दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा लोकजीवन से आश्रय पाकर आज भी कण-कण में गूँजती है। कण्व ऋषि की पालित पुत्री शकुंतला के पुत्र भरत ने मड़फा में ही शेर के दाँत गिने थे। राजा दुष्यंत के उत्तराधिकारी के रूप में अपने राज्य का विस्तार करके उसने ऐसे प्रतापी शासक का गौरव प्राप्त किया, जिसके नाम पर भरतखंड और भारतवर्ष को जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास भरत के नाम से अनेक गाँव हैं, जो इस कथा के पुष्ट और सच होने को आश्रय प्रदान करते हैं। वेदव्यास के नाम से विकृत होकर बना वतर्मान का बदौसा और भरतकूप के निकट स्थित व्यासकुंड आदि के माध्यम से मड़फा परिक्षेत्र की पौराणिकता को प्रमाणित किया जा सकता है।

समुद्रतल से 1240 फीट ऊँचाई पर स्थित मड़फा के दुर्ग में गुप्तकालीन स्थापत्य के साथ ही चंदेलकालीन स्थापत्य की जर्जर उपस्थिति ही सही, मगर यह इस दुर्ग की प्राचीनता को, और साथ ही इसकी भव्यता को बखानती जरूर है। मड़फा के दुर्ग ने गुजरात से आए बघेलवंशी शासक व्याघ्रदेव को भी आकर्षित किया था। 1290 विक्रमी संवत् में व्याघ्रदेव ने यहाँ आकर मुकुंददेव चंद्रावत की कन्या सिंधुमती से विवाह किया और मड़फा दुर्ग बघेल शासकों के आधिपत्य में आ गया। वीरसिंह देव, वीरभान देव और रामचंद्र बघेल ने यहाँ पर शासन किया। बाद में बघेल शासकों ने अपनी राजघानी को रीवा स्थानांतरित कर दिया। इस तरह लगभग दो सौ वर्षों तक बघेलों के शासन की गवाही भी मड़फा दुर्ग के कण-कण में दिखती है। मड़फा के नजदीक ही गोंडरामपुर नामक एक गाँव है। यह गाँव गोंड शासकों की उपस्थिति को सँजोए हुए है। गोंड शासकों की वंशावली में रानी दुर्गावती का नाम भी आता है। मड़फा के दुर्ग ने रानी दुर्गावती की वीरता की गाथा को भी विस्मृत नहीं किया है।
मड़फा दुर्ग की जटिल संरचना का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ पर बाहरी लोगों का आना आज भी उतना ही कठिन है, जितना कि पुराने जमाने में रहा होगा। इसी कारण अठारहवीं शताब्दी के मध्य में टीफेन्थलर नामक एक डच पादरी ही शायद सबसे पहले यहाँ पहुँचा होगा और उसने ही यहाँ के बारे में, यहाँ की भौगोलिक संरचना और यहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन किया होगा, क्योंकि उसके पहले के किसी इतिहासकार ने इसका उल्लेख नहीं किया है। टीफेन्थलर लिखता है कि उस समय इसे मण्डेफा के नाम से जाना जाता था। सन् 1804 में कर्नल मेसलबैक ने रात्रि में यहाँ पर आक्रमण किया था, ताकि इस क्षेत्र को हिंसक खूँखार कब्जेदारों से खाली कराया जा सके। बाद में उसने भी इस क्षेत्र को छोड़ देना ही उचित समझा। तब से आज तक यह क्षेत्र कमोबेश उपेक्षित ही रहा है।
जनश्रुतियों में प्रचलित है कि यहाँ से गुजरते हुए एक जैन व्यापारी को अकूत संपदा प्राप्त हुई थी। इस धन का धर्मार्थ में उपयोग करते हुए मड़फा दुर्ग में उसने जैन मंदिरों का निर्माण कराया। दुर्ग में मठ की आकृति के एक ध्वंसावशेष के समीप ही जैन मंदिर भी बने हुए हैं। पंचरथ योजना के अनुरूप बने इन जैन मंदिरों का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त हो चुका है और गर्भगृह में कोई मूर्ति भी नहीं है। गर्भगृह से दूर एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है। शायद इस मूर्ति को गर्भगृह से निकालकर यहाँ रखा गया है। इस भग्न मूर्ति में तीन फीट लंबी और एक फीट चौड़ी पादपीठिका है, जिसमें शिलालेख है। संस्कृत में लिखे इस शिलालेख के अनुसार 1408 माघ सुदी 5 रविवार को मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई है। इस शिलालेख के अनुसार छीतम ने अपने पिता गोसल और माता सलप्रण, अपने पितामह धने तथा मातामही तोण का नामोल्लेख किया है और गोसल के पुत्र छीतम ने इस मूर्ति की स्थापना कराई है। पादपीठ में अंकित शिलालेख के आधार पर इस मूर्ति को तेरहवीं शताब्दी का माना जा सकता है। मड़फा दुर्ग में लगभग दो मीटर ऊँची ऋषभनाथ की एक अन्य प्रतिमा भी है। यह प्रतिमा काफी हद तक सुरक्षित है, जबकि कई अन्य मूर्तियाँ भग्न स्थिति में हैं।
मड़फा में तांडव नृत्य करते शिव की दुर्लभ मूर्ति भी है। इसमें शिव अपने हाथों में विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र लिए हुए हैं। पादतल में एक राक्षस पड़ा हुआ है। नए मंदिर का निर्माण कराकर इस प्रतिमा को सुरक्षित करने का प्रयास स्थानीय लोगों द्वारा किया गया है। शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का आगमन भी होता है। इस मंदिर से लगभग आठ सौ मीटर दूर एक आश्रम बना हुआ है। यहाँ पर जल-प्रबंधन का प्राचीन और दुर्लभ प्रयोग देखा जा सकता है। यहाँ पर चट्टान को काटकर एक कुंड जैसा बनाया गया है, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल इकट्ठा होता रहता है और वर्षा नहीं होने पर भी इसमें जल उपलब्ध रहता है। इस जलकुंड के समीप एक कच्चा तालाब भी है। ऐसी मान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने पर चर्मरोग नष्ट हो जाते हैं। जलकुंड और तालाब को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्ग में पर्याप्त प्रबंध किए गए थे, ताकि युद्ध आदि की स्थिति में दुर्ग के अंदर संसाधनों की कमी न पड़े। चंदेलों के आठ प्रमुख दुर्ग में से एक मड़फा भी है और यहाँ मिलने वाले भग्नावशेष इस दुर्ग के अजेय होने की गवाही स्वयं ही दे देते हैं। इन भग्नावशेषों के साथ जुड़ी अनेक रोचक कथाएँ लोक-जीवन में कब से हैं, इनका अनुमान लगाना भी अपने आप में एक रोचक और रोमांचकारी खोज से कम नहीं होगा।
मड़फा दुर्ग के किस्से आज भी हैं, मगर ये किस्से किसी भरत के नहीं; माण्डव्य, अथर्वा, वेदव्यास, च्यवन और चरक जैसे ऋषियों-महर्षियों के नहीं, वरन् आतंक और दहशत के पर्याय दस्युओं और अपराधियों के हैं। इन किस्सों के पीछे मड़फा का ऐतिहासिक, भौगोलिक और पौराणिक महत्त्व छिप गया है। यहाँ रात की बात तो दूर, दिन में भी जाने से लोगों को डर लगता है। यहाँ वेदव्यास को उपचार के लिए ले जाने वाले महर्षि अथर्वा के शिष्यों की संततियाँ नहीं, बल्कि लूटने और यहाँ तक कि जीवन का भी हरण कर लेने वाले आधुनिक भारत के क्रूर आक्रांताओं का विचरण होता रहता है। मड़फा दुर्ग की अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ धन के लालच की भेंट चढ़ गईं। धन के लालच में ही हाथी दरवाजा, मंदिरों के गर्भगृह और ऐतिहासिक निर्मितियाँ खोद डाली गईं। यहाँ के दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य को डकैतों और अपराधियों के छिपने के सुगम ठिकानों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। विकास के संकेत भी यहाँ देखे नहीं जा सकते। यह दुर्ग, जो एक समय में अजेय था, अजेय आज भी है, मगर विकास के लिए। आज भी मड़फा दुर्ग तक जाने के लिए पगडंडियाँ ही हैं, जो मानपुर, कुरहम या खमरिया गाँव से होकर जाती हैं। मड़फा दुर्ग की यह दयनीय त्रासदी है, जो अधूरेपन के अपने दर्द को देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा के समय से आज तक बखान रही है। कालंजर का दुर्ग पर्यटन के विश्व-स्तरीय मानचित्र पर है, मगर मड़फा आज भी उपेक्षित है। मड़फा दुर्ग को आज की कथाओं से उबारकर अतीत की कथाओं तक ले जाने के लिए प्रयास अपेक्षित हैं और इन प्रयासों के लिए मड़फा का अजेय दुर्ग आज विजित होने की प्रत्याशा में कृशकाय होकर भी खड़ा है।
डॉ. राहुल मिश्र



(नगरपालिका परिषद्, हटा, जनपद- दमोह, मध्यप्रदेश द्वारा प्रकाशित और डॉ. एम.एम. पांडे द्वारा संपादित बुंदेली दरसन- 2017 में प्रकाशित)

Sunday, 15 January 2017

बरवा सागर




बरुआ सागर
प्राकृतिक सौंदर्य और शौर्य से परिपूर्ण एक नगर


वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की नगरी झाँसी से मानिकपुर की ओर जाने वाली सवारी गाड़ी के स्टेशन से रवाना होते ही अधिकांश यात्रियों के अंदर एक नए इंतजार को उपजते देखा जा सकता है। यह इंतजार सफ़र खत्म होने का नहीं है। यह इंतजार झाँसी के बाद आने वाले ओरछा स्टेशन से गाड़ी के आगे बढ़ते ही अपने चरम पर पहुँच जाता है। बेतवा नदी के पुल पर दौड़ती गाड़ी से उपजने वाली तेज आवाजें रेलगाड़ी के कोच में बरबस शुरू हो जाने वाली हलचलों को सुर दे देती हैं और बरुआ सागर स्टेशन पर गाड़ी के खड़े होते न होते दौड़ शुरू हो जाती है। झाँसी से भले ही भरपेट खाकर चले हों, मगर बीस-इक्कीस किलोमीटर के सफर में ही इतनी तगड़ी भूख उपज जाना कि दौड़ लगानी पड़ जाए, स्वयं में रोमांचित कर देने वाला है। स्टेशन पर बने चाय-पानी के स्टॉल में अच्छी-खासी भीड़ जमा हो जाती है। कोई पेड़े, तो कोई समोसे और कोई सब्जी-पूड़ी खा रहा होता है, या फिर खरीदकर ले जा रहा होता है। प्लेटफार्म पर सब्जीवालियों की लंबी कतार अलग आकर्षण रखती है। अदरख और कच्ची हल्दी से लगाकर सभी किस्म की सब्जियाँ यहाँ पर उपलब्ध हैं। अमरूद और मूँगफली के देशी स्टॉल भी कम नहीं होते हैं। विक्रेता महिलाओं की सुमधुर मिश्रित आवाजें गूँजती रहती हैं। अदरख ले लो अदराख...., अमरूद ले लो ताजे-मीठे आमरूद....। लोग समय का सदुपयोग करते नजर आते हैं। जल्दी-जल्दी सौदा पटाने और ढेर सारी सब्जियाँ खरीद लेने की होड़ नजर आती है। रेलगाड़ी के रुकने से लगाकर उसके रवाना होने तक की अवधि में किसने कितनी सब्जी खरीद ली, कितना जलपान कर लिया, जैसे विषय गाड़ी के रवाना होने के साथ ही क्षणिक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। लोगों के लिए अदरख और कच्ची हल्दी की खरीददारी ज्यादा रोमांचकारी होती है; उसी तरह, जैसे बरुआ सागर के पेड़े खाकर मानो संसार के सर्वोत्कृष्ट मिष्ठान्न को उदरस्थ कर लेने की सफलता से सुख की अनुभूति होती है। पुराने तरीके की बनी स्टेशन की इमारत और सारा स्टेशन परिसर गाड़ी के आगमन के साथ ही भागमभाग और चहल-पहल से भर जाता है। मानिकपुर की ओर से आने वाले रेलयात्रियों के साथ भी यही सब घटता है। रेलगाड़ी जाने के बाद स्टेशन में कैसी उदासियाँ पसरती होंगी और दूसरी गाड़ी के आने के इंतजार की घड़ियाँ कैसे गिनी जाती होंगी, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। दूसरे छोटे स्टेशनों से इतर बरुआ सागर स्टेशन पर कुछ अलग ही परिवेश बन जाता है, इस कारण कल्पनाओं को उड़ान भरने के लिए पंख मिल जाते हैं। स्टेशन के बाहर इस कस्बे का जीवन कैसा होगा, कई बार मन में प्रश्न उपजते हैं। आखिर इस छोटे-से कस्बे में सागर कहाँ से आ गया? अगर सागर है भी, तो कैसा है? लगता है कि जिसने बरुआ नदी में बने बाँध को सागर नाम दिया होगा, उसने शायद सागर देखा ही नहीं होगा, इसीलिए उस विशालकाय ताल को सागर मान लिया। ऐसा भी हो सकता है कि बुंदेलखंड की पथरीली जमीन पर, जहाँ जल का संकट अपना विकराल रूप दिखाने में पीछे नहीं रहता, वहाँ जल-प्रबंधन के ऐसे वृहदाकार निर्माण के प्रति आस्था ने सागर नाम दे दिया हो।

बरुआ सागर कस्बे का नाम बेतवा नदी की सहायक बरुआ नदी पर बने बाँध या वृहदाकार तालनुमा सागर के कारण पड़ा है। बरुआ सागर ताल का क्षेत्रफल लगभग एक हजार एकड़ का है। बुंदेला शासकों द्वारा स्थापित धार्मिक-ऐतिहासिक नगरी ओरछा के प्रतापी शासक राजा उदित सिंह ने सन् 1705 से 1735 के मध्य इस ताल का निर्माण कराया था। इस ताल के निर्माण का शिल्प भी अद्बुत है। आम जनता के लिए ताल का उपयोग सहज और सुलभ हो सके, इस हेतु तालाब में घुमावदार सीढ़ियाँ बनी हैं। ताल पर बना चौड़ा तटबंध पुल का काम भी करता है। ताल में जल-प्रबंधन के साथ ही जल के उच्च स्तर पर पहुँचने पर जल निकास की व्यवस्था भी है। लगभग नब्बे वर्ष पूर्व भीषण बाढ़ ने जल निकासी व्यवस्था को नष्ट कर दिया था, फिर भी यह ताल यहाँ के लोगों के लिए उपयोगी है। खेती के लिए जल संसाधन की उपलब्धता के कारण यहाँ पर खेतों में खूब हरियाली नजर आती है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित केन-बेतवा गठजोड़ परियोजना में बरुआ सागर ताल भी शामिल है और इस परियोजना के माध्यम से ताल तक जल पहुँचाने की योजना है।
बरुआ सागर के किनारे पर ऊँची समतल पहाड़ी पर किला भी है। इस किले का निर्माण भी ओरछा के राजा उदित सिंह द्वारा 1689 से 1736 के मध्य कराया गया था। किले की प्राचीर से बरुआ सागर का सुंदर नजारा और चारों तरफ पसरी हुई हरियाली बरबस ही मन को मोह लेती है। यहाँ की अनूठी प्राकृतिक सुंदरता और पठारी भूमि में पसरे धरती के सौंदर्य से अभिभूत होकर ही शायद बुंदेला शासकों ने इस किले को अपना ग्रीष्मकालीन किला बना लिया था। गर्मी के दिनों में वे यहीं पर प्रवास करते थे। संभवतः इसी कारण आज भी बरुआ सागर को बुंदेलखंड की शिमला नगरी भी कहा जाता है। बुंदेला शासकों के यहाँ आने के पहले इस इलाके में आबादी नहीं रही होगी, या बहुत कम संख्या में रही होगी, इस कारण बुंदेला शासकों को किले और ताल के निर्माण कार्य के लिए ओरछा से कामगारों को लाना पड़ा होगा। लगभग 47 वर्षों तक यहाँ पर चले निर्माण कार्य के पूर्ण हो जाने के बाद कामगारों के परिवार यहीं पर बस गए। इसी कारण यहाँ बसे अधिकांश लोग उन कामगारों के वंशज हैं, जो बरुआ सागर और किले के निर्माण हेतु यहाँ लाए गए थे। इनके पास इसी कारण बरुआ सागर से जुड़ी तमाम लोक-प्रचलित कथाएँ भी हैं।
बरुआ सागर की आबादी से लगभग ढाई किलोमीटर पहले एक ऊँचे टीले पर लगभग पाँच-छह फीट ऊँची चहारदीवारी के अंदर लाल बलुए पत्थरों से निर्मित लगभग पैंसठ फीट ऊँचा मंदिर है। इसे जरा का मठ (जरकी मठ) के रूप में जाना जाता है। लोक मान्यताएँ इस मंदिर को भाई-बहन का मंदिर मानती हैं। ऐसी कथा प्रचलित है कि बहन के जिद करने पर भाई ने इस मंदिर को एक रात में बनाकर तैयार कर दिया था। इस मंदिर में शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। यह मंदिर चंदेलकालीन है और चंदेलों के मांडलिक प्रतिहार शासकों द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। अपने स्थापत्य के कारण यह मठ ऐतिहासिक महत्त्व का है। पूर्वाभिमुख मठ में गर्भगृह, फिर अंतराल और फिर मुखमंडप है। मुखमंडल भग्नावस्था में है, जबकि मुख्य मंदिर के उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित भग्न छोटे मंदिरों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मुख्य मंदिर के चारों ओर चार छोटे-छोटे मंदिर रहे होंगे। मंदिर की ऊँचाई या विमान के साथ ही चार छोटे-छोटे मंदिरों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मंदिर पंचायतन शैली का है। मंदिर का गर्भगृह आयताकार है। आयताकार चौक प्रायः शेषशायी विष्णु या सप्तमातृका के मंदिरों में होती हैं। शेषशायी विष्णु की मूर्ति यहाँ नहीं है, मगर मंदिर के नाम से स्पष्ट होता है कि यह मंदिर शक्ति-साधना का केंद्र रहा होगा। श्री महाकाली अष्टोत्तर सहस्रनामावली में श्लोक है-
विद्याधरी वसुमती यक्षिणी योगिनी जरा ।
राक्षसी  डाकिनी  वेदमयी  वेदविभूषणा ।।26।।
महाकाली का एक नाम जरा भी है, इस तरह शाक्त-साधना के साथ इस मंदिर के संबंध का प्रमाण मिलता है। मंदिर का प्रवेश द्वार सुसज्जित है। इसमें चार पंक्तियों में नर्तकियों, अष्ट दिग्पालों, वाराहियों और द्वारपालों के साथ ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश,नरसिम्हा, लक्ष्मी-नारायण, सूर्य की प्रस्तर पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ हैं। द्वार के दोनों और गंगा और यमुना की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के शिखर का एक तिहाई हिस्सा टूटा हुआ है, जिसका जीर्णोद्धार कराया गया प्रतीत होता है। संभवतः बरुआ सागर और किले के निर्माण के दौरान बुंदेला शासकों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया होगा। बरुआ सागर के समीप ही घुघुआ मठ भी है। यह मठ भी चंदेलकालीन है और पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर नक्काशी को यहाँ पर भी देखा जा सकता है। इस मठ में चार दरवाजे हैं। तीन दरवाजों पर गणेश की प्रतिमाएँ हैं और चौथे दरवाजे पर दुर्गा की प्रतिमा है। यह मंदिर शैव-साधना का केंद्र रहा होगा, ऐसा माना जा सकता है।
स्थापत्य की इन बेजोड़ निर्मितियों के अतिरिक्त बरुआ सागर में प्राकृतिक निर्मितियाँ भी हैं। इनमें स्वर्गाश्रम प्रपात प्रमुख है। 1985 के आसपास इस स्थान पर चण्डी स्वामी शरणानंद जी सरस्वती द्वारा एक आश्रम का निर्माण कराया गया था। तब से यह स्थान पर्यटकों के लिए ही नहीं, वरन् श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। चारों तरफ फैली हरियाली, विभिन्न प्रकार के वृक्ष और उनकी शीतल छाया में कल-कल निनाद करता प्रपात का औषधियुक्त जल तन और मन, दोनों को सुख देता है। इस प्रपात के निकट तीन कुंड हैं, जिनमें इसका जल संग्रहीत होता है। प्रपात का जल गंधकयुक्त होने के कारण औषधीय गुणों से युक्त है और अनेक व्याधियों के उपचार हेतु लोग इस जल का उपयोग करते हैं। आश्रम के निकट ही हनुमान गुफा नामक एक प्राकृतिक निर्मिति है, जिसमें हनुमान जी की मशक स्वरूप प्रतिमा विराजमान है। यहाँ पर विभिन्न पर्वों में श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। गर्मी की ऋतु में यहाँ पर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। दूर्वा का विशाल उद्यान भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
बरुआ सागर, घुघुआ मठ, जरा का मठ और स्वर्गाश्रम प्रपात बुंदेले और मराठों के संघर्ष के गवाह भी हैं। सन् 1744 में यहाँ पर बुंदेले और मराठों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, जिसमें रानोजी सिंधिया के पुत्र और महाराजा माधोजी सिंधिया के अग्रज ज्योति भाऊ शहीद हुए थे। युद्ध के समापन के बाद पेशवा ने आदेश दिया था कि बरुआ सागर से वसूली जाने वाली लगान से दस हजार सालान का भुगतान शहीद ज्योति भाऊ की पत्नी को किया जाए। आश्चर्यजनक तरीके से यह भुगतान एक सौ ग्यारह वर्षों तक ग्वालियर दरबार को होता रहा। ज्योति भाऊ की बेवा के गुजर जाने के बाद यह रकम उनके परिवार के दूसरे लोगों को मिलती रही। सन् 1855 में, जब झाँसी पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया, तब अंग्रेज हुक्मरानों ने इसे रोकने की कार्यवाही की। अंग्रेजों ने आदेश जारी किया कि अधिकार के रूप में इस धनराशि का पाने का हक ग्वालियर घराने को नहीं है, बशर्ते कृपापूर्वक इसका भुगतान किया जा सकता है। लगभग एक सौ ग्यारह वर्षों तक बरुआ सागर की लगान से ग्वालियर दरबार अपनी जेबें भरता रहा।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और उनके पति गंगाधर राव को भी बरुआ सागर से बहुत लगाव रहा है। गंगाधर राव तो अकसर अपना समय यहीं पर गुजारा करते थे। गंगाधर राव के निधन के उपरांत झाँसी का राज्य राजनीतिक अस्थिरता से घिर गया। इसका लाभ उठाकर ओरछा के प्रधानमंत्री नाथे खाँ ने बरुआ सागर पर कब्जा करने की कोशिश की। उसने बरुआ सागर पर कब्जा भी कर लिया और आगे बढ़कर झाँसी के किले को भी घेर लिया। बाद में रानी झाँसी की सूझबूझ और पराक्रम के कारण नाथे खाँ को वहाँ से भागना पड़ा। रानी झाँसी ने अपने पिता मोरोपंत तांबे के नेतृत्व में चार सौ सैनिकों की फौज भेजकर बरुआ सागर को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। जिस समय रानी झाँसी अंग्रेजों से संघर्ष कर रही थीं, उस समय बरुआ सागर के आसपास के इलाके में डाकू कुँवर सागर सिंह का आतंक हुआ करता था। वह रानी झाँसी के पराक्रम से इतना प्रभावित हुआ, कि अपने सारे साथियों के साथ रानी झाँसी की फौज में शामिल हो गया। उन दिनों बरुआ सागर क्रांति की ज्वाला से धधक रहा था। अंग्रेजों को जितना खतरा झाँसी में महसूस होता था, उससे कम खतरा बरुआ सागर में महसूस नहीं होता था। इसी कारण अंग्रेजों की तमाम गुप्तचर एजेंसियाँ यहाँ पर सक्रिय रहती थीं। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से लगाकर देश की आजादी तक बरुआ सागर स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ रहा। जिस समय देश के विभिन्न हिस्सों में छापाखानों में समाचारपत्र छपा करते थे और स्वतंत्रता सेनानियों के पास भेजे जाते थे, उस समय बरुआ सागर में रातों-रात हस्तलिखित समाचार पत्र तैयार किए जाते थे और रातों-रात ही उनका वितरण आसपास के इलाकों में, शहरों में किया जाता था। वितरण करने वाले स्वाधीनता सेनानी रात में पत्र लेकर निकलते थे और सुबह होने के पहले ही पत्र बाँटकर वापस आ जाते थे। बरुआ सागर से चलने वाली इस क्रांतिकारी गतिविधि ने अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी। इस काम को करने वाले सेनानियों को तलाश पाना अंग्रेजों के लिए बहुत कठिन था। अंग्रेजों के गुप्तचर बरुआ सागर में अपना डेरा डाले ही रहते, और क्रंतिकारी अपना काम बखूबी कर ले जाते। अनेक अंग्रेज अधिकारियों ने अपने संस्मरणों में बरुआ सागर का इसी कारण खूब जिक्र किया है।
जाने-माने रंगकर्मी, नाट्य-समीक्षक, समालोचक, पत्रकार, कवि, अनुवादक और शिक्षक पद्मश्री नेमिचंद्र जैन का बचपन बरुआ सागर में ही गुजरा है। वृंदावनलाल वर्मा की रचनाओं में बरुआ सागर का सौंदर्य निखरता है। और भी तमाम कवि, साहित्यकार, इतिहासकार; चाहे वे विदेशी हों, या देशी हों, बरुआ सागर उनके लिए रोमांच से भरा रहा है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और यहाँ के कण-कण में बसी अतीत की गाथाएँ उन्हें अपनी खींचती रही हैं।
बरुआ सागर के स्टेशन में रेलगाड़ी के आते ही अचानक बढ़ जाने वाली चहल-पहल ही केवल इसकी पहचान नहीं है। यहाँ की अनूठी प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ की ऐतिहासिक विरासत न केवल शासकों को; वरन् जिज्ञासुओं को, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। यह अलग बात है कि शिमला जैसे बहुचर्चित और महँगे शहर के आकर्षण में हम अपने बुंदेलखंड के शिमला से भी खूबसूरत इलाके को विस्मृत कर बैठे हों।
बरुआ सागर के स्टेशन में सब्जियाँ, मूँगफली और अमरूद बेचती महिलाएँ आत्मसम्मान के साथ जीने का यत्न करती नजर आती हैं। रानी झाँसी ने प्रण किया था कि अपने जीते जी अपनी झाँसी नहीं दूँगी। उनका आत्मसम्मान, उनका आत्मगौरव, उनका पराक्रम, उनका शौर्य यहाँ कण-कण में, जल की हर-एक बूँद में आज भी बसता है। इसलिए गरीबी और जीवन जीने की विकट जद्दोजहद ने यहाँ की महिलाओं को लाचार-बेबस नहीं बनाया है। यहाँ से गुजरने वाले यात्रियों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि महिलाएँ सिर पर वजनी टोकरी उठाए सुबह से देर शाम तक गाड़ियों में भाग-भागकर सब्जियाँ, मूँगफली बेचती क्यों नजर आती हैं? यह इस धरती का गुण-धर्म है, यहाँ की पहचान है। अपने अतीत के गौरव से गर्वोन्नत बरुआ सागर से गुजरते हुए इस पुण्यश्लोका धरा को प्रणाम कर लेने का मन होता है। 



डॉ. राहुल मिश्र 

(बुंदेली दरसन- 2016, अंक-09, प्रकाशक- नगरपालिका परिषद, हटा, जिला- दमोह, संपादक- डॉ. एम.एम. पाण्डे)

Tuesday, 27 September 2016


लदाख का धार्मिक नृत्य- छम


हिमालय के उच्चतम शिखरों में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा अपनी अनूठी धार्मिक विशिष्टताओं और इन विशेषताओं के साथ मिलकर विकसित हुई अनूठी संस्कृति के कारण युगों-युगों से धर्मभीरुओं को, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। हिमालय में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का जीवित-जीवंत केंद्र लदाख है, जहाँ पर आज भी इस अनूठी संस्कृति की, इसकी धार्मिक व्यवस्था की झलक देखी जा सकती है। यह परंपरा जहाँ एक ओर भारत के गौरवपूर्ण अतीत को अपने में समेटे हुए है, वहीं दूसरी ओर तिब्बत से आने वाली सांस्कृतिक-धार्मिक व्यवस्था यहाँ पर जीवंत हो उठी है। लदाख अपने अतीत से ही देश-दुनिया के लिए जिज्ञासाओं के भंडार की तरह रहा है। देश-दुनिया में होते आधुनिकीकरण से बेखबर लदाख अंचल अपनी अनूठी धार्मिक व्यवस्था को, धार्मिक व्यवस्था में निहित विशेषताओं को बचाए रहा है। लदाख की सामाजिक व्यवस्था आज भी धार्मिक परंपराओं में बँधी हुई है और लदाख का समाज आज भी धर्मभीरु है। धर्म के प्रति आस्था और इस आस्था की दृढ़ता अपनी निरंतर गतिशीलता के साथ आज भी देश-दुनिया के पर्यटकों को, श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। लदाख में विभिन्न तिथियों में होने वाले धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों और पर्वों-त्योहारों की लंबी सूची है। महायान बौद्ध परंपरा के सिद्धांतों का भौतिक पक्ष इन अनुष्ठानों, पर्वों और त्योहारों में देखा जा सकता है। लदाख के गृहस्थ बौद्ध धर्मानुयायियों के दैनिक पूजा-कर्म के साथ ही बौद्ध मठों-मंदिरों, अर्थात् गोनपाओं में आयोजित होने वाले पूजा-अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व है। लदाख की गोनपाएँ यहाँ की धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतीक हैं। वैसे तो इन गोनपाओं में वर्ष-पर्यंत पूजा-अनुष्ठान होते रहते हैं, मगर वार्षिक अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व होता है। लदाख की कुछ प्राचीन और विशिष्ट गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के दौरान होने वाला धार्मिक नृत्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। इस नृत्य को छम कहा जाता है। यह धार्मिक नृत्य गोनपाओं के भिक्षुओं द्वारा किया जाता है और इसमें प्रशिक्षित भिक्षुगण विभिन्न प्रकार के मुखौटे लगाकर नृत्य करते हैं। इस कारण इस धार्मिक नृत्य को मुखौटा नृत्य भी कहा जाता है।
छम नृत्य मूल रूप से तांत्रिक अनुष्ठान के अंतर्गत होने वाला नृत्य होता है। यह तांत्रिक नृत्यानुष्ठान महायान बौद्ध परंपरा का विशिष्ट अंग है। महयान परंपरा में वर्णित धर्मरक्षकों, धर्मपालों, देव-देवियों, डाकिनियों और अन्य दैवीय स्वरूपों के प्रतीक के रूप में बने हुए मुखौटे और वस्त्र धारण करके इस विशिष्ट तांत्रिक नृत्यानुष्ठान को संपन्न किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि छम नृत्य की उत्पत्ति भगवान बुद्ध के समय उनके द्वारा ही हुई थी। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कर्नाटक में स्थित श्रीधान्यकटक नामक तीर्थक्षेत्र में भगवान बुद्ध ने महायान परंपरा के विनेयजनों को उपदेश दिया। अपने उपदेश में उन्होंने अनुत्तरयोग तंत्र भूमि-पूजा, जिसे त्सई-छो-ग कहा जाता है, के बारे में बताते हुए नृत्य करने की विधि बताई। यह नृत्य सामान्य नृत्य नहीं, वरन् शत्रु-नाश के लिए देव, डाकिनी, धर्मरक्षकों आदि के मुखौटे एवं वस्त्र धारण करके किया जाने वाला तांत्रिक नृत्यानुष्ठान था। भगवान बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेश के अनुरूप राजा इंद्रबोधि ने इस नृत्यानुष्ठान की विधि का प्रचार-प्रसार किया। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान आर्य नागार्जुन के कर्मक्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध कर्नाटक के नागार्जुनकोंडा नामक स्थान में हुए उत्खनन में नृत्य के लिए बने प्रांगण के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि तांत्रिक नृत्यानुष्ठान की, छम की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसी कालखंड में जैन परंपरा में भी धार्मिक नृत्यानुष्ठान की परंपरा प्रचलित हुई थी। जैन संन्यासी मंदिरों में रात-रातभर नृत्यानुष्ठान किया करते थे। जैन परंपरा में प्रचलित रासग्रंथों में वर्णित कथाओं का नृत्याभिनय जैन परंपरा में साधना-पद्धति के रूप में प्रचलित था। कमोबेश इसी प्रकार की परंपरा छम में देखी जा सकती है। अंतर केवल इतना ही है कि जैन मंदिरों में होने वाला रास तांत्रिकनृत्य नहीं होता, जबकि बौद्ध धर्म की महायान परंपरा में होने वाला छम तांत्रिक नृत्य होता है।
कर्नाटक के श्रीधान्यकटक और नागार्जुनकोंडा से चलकर छम नृत्य की परंपरा तिब्बत में विकसित हुई। नौवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में तिब्बत के शासक ठ्रिसङ्-दे-च़न के आमंत्रण पर आचार्य शांतिरक्षित भारत से तिब्बत गए और वहाँ पर महयान बौद्ध परंपरा का विस्तार करने हेतु एक बौद्ध विहार के निर्माण की शुरुआत की, मगर विहार के निर्माण में अनेक प्रकार की बाधाएँ पैदा होने लगीं। तब उन्होंने गुरु पद्मसंभव को आमंत्रित करने हेतु धर्मराज ठ्रिसङ्-दे-च़न से अनुरोध किया। गुरु पद्मसंभव तंत्रविद्या के प्रकांड विद्वान थे। गुरु पद्मसंभव ने आमंत्रण स्वीकार किया और तिब्बत में पहुँचकर दोर्जे-गुर-छम नामक तांत्रिक नृत्यानुष्ठान करके विहार के निर्माण में बाधक तत्त्वों को समाप्त किया। इस प्रकार तिब्बत में समये नामक बौद्ध विहार की स्थापना हुई, जो तिब्बत में छम नृत्य के विकास का पहला केंद्र बना। कालांतर में संस्कृत ग्रंथों के तिब्बती भाषा में हुए अनुवाद के माध्यम से तिब्बत में छम नृत्यानुष्ठान की विधियों का, इसकी बारीकियों और इसके प्रयोजन का अध्ययन सुलभ हुआ।
लदाख में तिब्बत से आने वाली महायान बौद्ध परंपरा के साथ ही छम या मुखौटा नृत्य की परंपरा प्रचलित हुई। ऐसी मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव का लदाख में आगमन हुआ था और उन्होंने वर्तमान करगिल जनपद के जङ्स्कर क्षेत्र में स्थित कनिका स्तूप के निकट तांत्रिक साधना की थी। संभव है कि उन्होंने इस स्थान की नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक नृत्यानुष्ठान भी किया हो। इस प्रकार लदाख की विभिन्न प्राचीन गोनपाओं में छम की परंपरा प्रचलित हुई। लदाख की सभी प्रमुख गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के समय भिक्षुओं द्वारा धर्मरक्षकों, धर्मपालों, रक्षकों, देव, डाकिनियों आदि के मुखौटे लगाकर, उनके हस्त-प्रतीकों को धारण करके छम नृत्यानुष्ठान करने की प्राचीन परंपरा देखने को मिलती है। छम नृत्य की विभिन्न मुद्राएँ धार्मिक कार्यों में बाधा पहुँचाने वाले शत्रुओं को, नकारात्मक शक्तियों का शमन करने की प्रक्रिया प्रदर्शित करती हैं। इनमें नकारात्मक शक्तियों को बाँधना, कुचलना, काटना आदि शामिल होता है। बौद्ध धर्म की महायान साधना परंपरा में चार प्रकार के संप्रदाय हैं। इन्हें सा-क्या, कर्ग्युद, ञिङमा और गेलुग के नाम से जाना जाता है। इन चारों संप्रदायों में सामान्य भिन्नताएँ होती हैं। लदाख में इन चारों संप्रदायों के विशिष्ट जनों द्वारा, रिनपोछे द्वारा छम का प्रारंभ किया गया। लदाख में प्रत्येक संप्रदाय से संबद्ध प्रमुख गोनपाओं में होने वाले छम नृत्यों में भी सामान्य विभेद होता है। यह भिन्नता मुखौटों, नृत्य के दौरान पद संचालन, नर्तकों के आगे-पीछे मुड़ने की विधि, पदचाल की संख्या और वाद्य यंत्रों के प्रयोग की विधियों में होता है। ये विभिन्नताएँ सामान्य दर्शकों को समझ में नहीं आ सकतीं।
लदाख की गोनपाओं में छम नृत्यानुष्ठान प्रायः कृष्णपक्ष की अठारहवीं से उनीसवीं तिथियों में या अठाईसवीं से उनतीसवीं तिथियों में आयोजित किए जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि जिस तरह कृष्णपक्ष में चंद्रमा की रोशनी क्रमशः घटती जाती है, उसी तरह छम के प्रभाव से नकारात्मक शक्तियों की, धर्मशासन को हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं की शक्ति भी क्रमशः घटती जाती है। लदाख में स्थित विभिन्न प्रमुख गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम की तिथियाँ अलग-अलग होती हैं, साथ ही छम में प्रदर्शित होने वाले दैवीय स्वरूपों में भी अंतर होता है। भोटी पंचांग के अनुसार पाँचवें माह की नवमी एवं दशमी तिथियों को हेमिस छेसचू के अवसर पर हेमिस गोनपा में छम का आयोजन होता है। हेमिस गोनपा में गुरु छ़नग्यद (अष्टगुरु पद्मसंभव) के साथ ही देव, डाकिनी और धर्मरक्षकों का नृत्यानुष्ठान होता है। भोटी पंचाङ के छठे मास की नवमी एवं दशमी तिथियों में डगथोग गोनपा में छेसचू या दशमी उत्सव के अवसर पर वज्रपाणि तथा गुरु छनग्यद का छम होता है। चेमड़े गोनपा में भोटी पंचाङ के नौवें माह की अट्ठाइसवीं एवं उनतीसवीं तिथि पर वङछोग अनुष्ठान के अवसर पर महाकाल एवं अन्य धर्मरक्षकों का छम होता है। इन्हीं तिथियों में डगथोग गोनपा में होने वाले वङ्छोग अनुष्ठान में वज्रकुमार, युमखोर लोग्यद दनमा, दस रौद्र और ल्हमो आदि का छम होता है। इस तरह लदाख की विभिन्न गोनपाओं में धर्मराज महाकाल के माता-पिता का छम, षड्भुज महाकाल, श्वेत महाकाल, वैश्रवण, हिरण और चमरी आदि का छम होता है। छम नृत्यानुष्ठान में पाई जाने वाली ये विविधताएँ अलग-अलग कथा-सूत्रों के माध्यम से श्रद्धालुओं की धर्मपिपासा को शांत करती हैं।
छम नृत्यानुष्ठान में मुखौटों का विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि मुखौटों के माध्यम से ही स्वरूपों का पता चलता है। छम में प्रयुक्त होने वाले मुखौटे लकड़ी या मिट्टी के बने होते हैं। मुखौटों के रंग और उनके आकार धर्मरक्षक, देव, डाकिनी और अन्य दैवीय स्वरूपों के अनुसार होते हैं। मुखौटे प्रायः नीले, पीले, सफेद और लाल रंग के होते हैं। धर्मरक्षकों के लिए कंकाल के आकार वाले मुखौटे और वस्त्र होते हैं। छम नृत्य करने वाले भिक्षुओं के लिए वस्त्र भी विशेष प्रकार के होते हैं। रेशमी छम-वस्त्रों को पङखेब कहा जाता है। छम नृत्य के दौरान तलवार, कपाल, त्रिशूल, कील और धनुष-बाण आदि भी धारण किए जाते हैं। छम के दौरान काली टोपी धारण करने वाले साधक के प्रतीक होते हैं, जो शत्रु-नाशक कपाल के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का विनाश करते हुए दिखते हैं। छम नृत्यानुष्ठाने के लिए संगीत-ध्वनियाँ भी विशिष्ट होती हैं और साथ ही वाद्य-यंत्र भी अलग होते हैं। छम नृत्य के लिए प्रयोग होने वाला रगदोङ ताँबे से बना लंबा-सा तुरहीनुमा वाद्ययंत्र होता है, जिसे दो या तीन हिस्सों में अलग किया जा सकता है। रगदोङ को बजाने के लिए विधिवत् शिक्षा लेनी पड़ती है और परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी पड़ती है। रगदोङ की छम नृत्य में मुख्य भूमिका होती है, क्योंकि इसकी धुन पर ही छम नृत्य का संचालन होता है। बुगजल बड़े आकार के मंजीरे या खतल के समान होता है। स्ङा बड़े आकार की गोलाकार लकड़ी का बना हुआ वाद्ययंत्र होता है और इसे एक लंबी धनुषाकार लकड़ी द्वारा बजाया जाता है।
छम नृत्यानुष्ठान गोनपा के विशाल प्रांगण में खुले आसमान के नीचे किया जाता है। यह प्रांगण प्रायः मुख्य मंदिर के सम्मुख होता है। छम नृत्य के दौरान प्रायः उन देवी-देवताओं या धर्मरक्षकों के थङ्का चित्र भी प्रदर्शित किए जाते हैं, जिनका छम होता है। खुले आसमान के नीचे होने वाले इस तांत्रिक अनुष्ठान में प्राकृतिक आपदाएँ, जैसे- बरसात, आँधी आदि न आएँ, इसके लिए भी पूजा की जाती है, तत्पश्चात छम का प्रारंभ होता है। गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम नृत्यानुष्ठान को देखने के लिए तमाम श्रद्धालुगण एकत्रित होते हैं। यह नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं, वरन् तांत्रिक अनुष्ठान के लिए होता है, इस कारण इसके दर्शन-मात्र से ही व्यक्ति की सारी विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं। छम नृत्य को देखना शुभ माना जाता है। इस कारण आस्थावान श्रद्धालु छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ के लिए उमड़ पड़ते हैं और खुले आसमान के नीचे श्रद्धाभाव से करबद्ध होकर अपने कल्याण की कामना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवों और धर्मरक्षकों के मुखौटों के दर्शन से ही जीवन में विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं और चित्त को असीमित शांति मिलती है।
लदाख अंचल की गोनपाओं में अलग-अलग तिथियों में आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान लदाख की धर्मभीरु जनता के लिए जीवन के संघर्षों को, जीवन की जटिलताओं और मुसीबतों को झेलने की ताकत देते हैं। छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ से उनकी आस्था की पुष्टि ही नहीं होती, वरन् उन्हें जीवन जीने की नई दिशा भी मिलती है। विश्व के कल्याण का भाव, सभी जीवों के कल्याण का बोध; सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और करुणा जैसे उदात्त गुणों का विकास भी होता है। संभवतः इसी कारण छम नृत्य के प्रति पर्यटकों की जिज्ञासा भी देखने को मिलती है और प्रतिवर्ष अनेक देशी-विदेशी पर्यटक छम नृत्यानुष्ठान का दर्शन करने के लिए लदाख की यात्रा करते हैं। भारत की पुरातन धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा के संरक्षित स्वरूप के साथ ही हिमालय अंचल की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के रूप में लदाख में प्रचलित छम नृत्य का अपना अतुलनीय स्थान है।  
कार्यकारी संपादक- नूतनवाग्धारा

       (दूरदर्शन केंद्र, लेह द्वारा वृत्तचित्र निर्माण एवं दिनांक 01 अप्रैल, 2016 को 1730 से 1800 बजे तक प्रसारित।)