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Friday, 2 June 2017

मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं




मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं

बुंदेलखंड का विंध्य अंचल अपने अतीत से ही अनेक पुरा-कथाओं और मिथकों का केंद्र रहा है। यहाँ कण-कण में ऐसी रोमांचकारी कथाएँ बसी हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्य में भी डाल देती हैं और अपने आकर्षण में जकड़ भी लेती हैं। बाँदा जनपद के कालंजर दुर्ग के माहात्म्य को जानने वाले इतना अवश्य जानते होंगे की शैव-साधना का यह केंद्र एक रात में ही बनकर तैयार हो गया था। देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा ने कालंजर के दुर्ग को एक रात में ही बना दिया था, ऐसी मान्यता है। कालंजर के साथ ही कालंजर के पूर्वोत्तर की ओर लगभग सोलह मील दूर मड़फा का दुर्ग भी उसी रात बनना शुरू हुआ था, जिस रात कालंजर का निर्माण हो रहा था। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जी ने पहले कालंजर का दुर्ग बनाया और उसके तैयार हो जाने के बाद मड़फा के दुर्ग को बनाने का काम शुरू किया। रात बीत गई और मड़फा दुर्ग के पूरी तरह से नहीं बन पाने के कारण यह अधूरा ही रह गया। और वास्तव में यह दुर्ग कभी पूरी तरह से नहीं बन पाया। लोक-जीवन में जीवित यह कथा आज भी मड़फा की वीरानियों में गूँजती है। मड़फा दुर्ग का यह अधूरापन आज भी महसूस किया जा सकता है। इसकी वीरानियों में गुलज़ार होने की कसक आज भी महसूस होती है और इसी कारण बरबस ही लगता है कि यदि यह दुर्ग अधूरा न होता, तो शायद कालंजर से भी सुंदर, मोहक और आकर्षक होता। छत्रपति शिवाजी महाराज के शिवनेरी दुर्ग की भाँति अगम्य ऊँचाई में बना यह दुर्ग इतना समर्थ होता, कि कभी कोई आक्रांता इसे जीत नहीं पाता। वैसे भी इस दुर्ग को अजेय ही कहा जा सकता है, क्योंकि सन् 1780 में छछरिहा के युद्ध के पहले तक इस दुर्ग को जीतने में कोई सफल नहीं हो सका था। पन्ना के बघेल राजा हरिवंश राय और बाँदा के नवाब के बीच हुए छछरिहा के संग्राम के बाद यह दुर्ग अपना अस्तित्व खोता गया।
ऐसी मान्यता है कि महर्षि अर्थवर्ण का आश्रम मड़फा में ही था। महर्षि महाअर्थवर्ण को अथर्वा के नाम से भी जाना जाता है और उनके कारण ही चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद को जाना जाता है। महर्षि अथर्वा की पहचान महर्षि वेदव्यास के श्वसुर के रूप में, और इसी कारण मड़फा को वेदव्यास की ससुराल के रूप में भी जानते हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘कृष्ण द्वैपायन व्यास’ में उल्लेख किया है कि एक बार महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती से मिलने के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान- ग्राम हस्तम, जनपद बाँदा) जा रहे थे। रास्ते में वाग्मती नदी (वर्तमान- बागे नदी, बदौसा, बाँदा) के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें पकड़कर मारपीट शुरू कर दी, जिस कारण वेदव्यास बेहोश हो गए। वहाँ से गुजरते हुए महाअर्थर्वण के शिष्यों ने महर्षि व्यास की दयनीय दशा को देखा और उन्हें उठाकर महाअर्थवर्ण के आश्रम में ले आए। महाअर्थवर्ण की पुत्री वाटिका ने बड़ी लगन के साथ महर्षि व्यास की सेवा-सुश्रुषा की। बाद में महर्षि व्यास ने वाटिका से विवाह कर लिया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे व्यासपुत्र सुखदेव के नाम से जाना जाता है।
अपनी जर्जर काया को आयुर्वेद की चिकित्सा के माध्यम से युवा कर लेने वाले महर्षि च्यवन का आश्रम भी मड़फा में था, ऐसी मान्यता है। चरक संहिता सहित आयुर्वेद की अनेक पुस्तकों के रचयिता और सुप्रसिद्ध वैद्य चरक ऋषि का आश्रम भी मड़फा में ही था। लोक-प्रचलित कथाओं और मिथकों का अनूठा संगम मड़फा में देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है कि माण्डव्य ऋषि के आश्रम से इस स्थान का नाम मड़फा पड़ा है। माण्डव्य ऋषि के आश्रम में कण्व ऋषि समेत अनेक ऋषि रहा करते थे। दुष्यंत और शकुंतला की पुरा-ऐतिहासिक गाथा के पुष्पन-पल्लवन का स्थान भी यही माना जाता है। दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा लोकजीवन से आश्रय पाकर आज भी कण-कण में गूँजती है। कण्व ऋषि की पालित पुत्री शकुंतला के पुत्र भरत ने मड़फा में ही शेर के दाँत गिने थे। राजा दुष्यंत के उत्तराधिकारी के रूप में अपने राज्य का विस्तार करके उसने ऐसे प्रतापी शासक का गौरव प्राप्त किया, जिसके नाम पर भरतखंड और भारतवर्ष को जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास भरत के नाम से अनेक गाँव हैं, जो इस कथा के पुष्ट और सच होने को आश्रय प्रदान करते हैं। वेदव्यास के नाम से विकृत होकर बना वतर्मान का बदौसा और भरतकूप के निकट स्थित व्यासकुंड आदि के माध्यम से मड़फा परिक्षेत्र की पौराणिकता को प्रमाणित किया जा सकता है।

समुद्रतल से 1240 फीट ऊँचाई पर स्थित मड़फा के दुर्ग में गुप्तकालीन स्थापत्य के साथ ही चंदेलकालीन स्थापत्य की जर्जर उपस्थिति ही सही, मगर यह इस दुर्ग की प्राचीनता को, और साथ ही इसकी भव्यता को बखानती जरूर है। मड़फा के दुर्ग ने गुजरात से आए बघेलवंशी शासक व्याघ्रदेव को भी आकर्षित किया था। 1290 विक्रमी संवत् में व्याघ्रदेव ने यहाँ आकर मुकुंददेव चंद्रावत की कन्या सिंधुमती से विवाह किया और मड़फा दुर्ग बघेल शासकों के आधिपत्य में आ गया। वीरसिंह देव, वीरभान देव और रामचंद्र बघेल ने यहाँ पर शासन किया। बाद में बघेल शासकों ने अपनी राजघानी को रीवा स्थानांतरित कर दिया। इस तरह लगभग दो सौ वर्षों तक बघेलों के शासन की गवाही भी मड़फा दुर्ग के कण-कण में दिखती है। मड़फा के नजदीक ही गोंडरामपुर नामक एक गाँव है। यह गाँव गोंड शासकों की उपस्थिति को सँजोए हुए है। गोंड शासकों की वंशावली में रानी दुर्गावती का नाम भी आता है। मड़फा के दुर्ग ने रानी दुर्गावती की वीरता की गाथा को भी विस्मृत नहीं किया है।
मड़फा दुर्ग की जटिल संरचना का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ पर बाहरी लोगों का आना आज भी उतना ही कठिन है, जितना कि पुराने जमाने में रहा होगा। इसी कारण अठारहवीं शताब्दी के मध्य में टीफेन्थलर नामक एक डच पादरी ही शायद सबसे पहले यहाँ पहुँचा होगा और उसने ही यहाँ के बारे में, यहाँ की भौगोलिक संरचना और यहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन किया होगा, क्योंकि उसके पहले के किसी इतिहासकार ने इसका उल्लेख नहीं किया है। टीफेन्थलर लिखता है कि उस समय इसे मण्डेफा के नाम से जाना जाता था। सन् 1804 में कर्नल मेसलबैक ने रात्रि में यहाँ पर आक्रमण किया था, ताकि इस क्षेत्र को हिंसक खूँखार कब्जेदारों से खाली कराया जा सके। बाद में उसने भी इस क्षेत्र को छोड़ देना ही उचित समझा। तब से आज तक यह क्षेत्र कमोबेश उपेक्षित ही रहा है।
जनश्रुतियों में प्रचलित है कि यहाँ से गुजरते हुए एक जैन व्यापारी को अकूत संपदा प्राप्त हुई थी। इस धन का धर्मार्थ में उपयोग करते हुए मड़फा दुर्ग में उसने जैन मंदिरों का निर्माण कराया। दुर्ग में मठ की आकृति के एक ध्वंसावशेष के समीप ही जैन मंदिर भी बने हुए हैं। पंचरथ योजना के अनुरूप बने इन जैन मंदिरों का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त हो चुका है और गर्भगृह में कोई मूर्ति भी नहीं है। गर्भगृह से दूर एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है। शायद इस मूर्ति को गर्भगृह से निकालकर यहाँ रखा गया है। इस भग्न मूर्ति में तीन फीट लंबी और एक फीट चौड़ी पादपीठिका है, जिसमें शिलालेख है। संस्कृत में लिखे इस शिलालेख के अनुसार 1408 माघ सुदी 5 रविवार को मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई है। इस शिलालेख के अनुसार छीतम ने अपने पिता गोसल और माता सलप्रण, अपने पितामह धने तथा मातामही तोण का नामोल्लेख किया है और गोसल के पुत्र छीतम ने इस मूर्ति की स्थापना कराई है। पादपीठ में अंकित शिलालेख के आधार पर इस मूर्ति को तेरहवीं शताब्दी का माना जा सकता है। मड़फा दुर्ग में लगभग दो मीटर ऊँची ऋषभनाथ की एक अन्य प्रतिमा भी है। यह प्रतिमा काफी हद तक सुरक्षित है, जबकि कई अन्य मूर्तियाँ भग्न स्थिति में हैं।
मड़फा में तांडव नृत्य करते शिव की दुर्लभ मूर्ति भी है। इसमें शिव अपने हाथों में विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र लिए हुए हैं। पादतल में एक राक्षस पड़ा हुआ है। नए मंदिर का निर्माण कराकर इस प्रतिमा को सुरक्षित करने का प्रयास स्थानीय लोगों द्वारा किया गया है। शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का आगमन भी होता है। इस मंदिर से लगभग आठ सौ मीटर दूर एक आश्रम बना हुआ है। यहाँ पर जल-प्रबंधन का प्राचीन और दुर्लभ प्रयोग देखा जा सकता है। यहाँ पर चट्टान को काटकर एक कुंड जैसा बनाया गया है, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल इकट्ठा होता रहता है और वर्षा नहीं होने पर भी इसमें जल उपलब्ध रहता है। इस जलकुंड के समीप एक कच्चा तालाब भी है। ऐसी मान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने पर चर्मरोग नष्ट हो जाते हैं। जलकुंड और तालाब को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्ग में पर्याप्त प्रबंध किए गए थे, ताकि युद्ध आदि की स्थिति में दुर्ग के अंदर संसाधनों की कमी न पड़े। चंदेलों के आठ प्रमुख दुर्ग में से एक मड़फा भी है और यहाँ मिलने वाले भग्नावशेष इस दुर्ग के अजेय होने की गवाही स्वयं ही दे देते हैं। इन भग्नावशेषों के साथ जुड़ी अनेक रोचक कथाएँ लोक-जीवन में कब से हैं, इनका अनुमान लगाना भी अपने आप में एक रोचक और रोमांचकारी खोज से कम नहीं होगा।
मड़फा दुर्ग के किस्से आज भी हैं, मगर ये किस्से किसी भरत के नहीं; माण्डव्य, अथर्वा, वेदव्यास, च्यवन और चरक जैसे ऋषियों-महर्षियों के नहीं, वरन् आतंक और दहशत के पर्याय दस्युओं और अपराधियों के हैं। इन किस्सों के पीछे मड़फा का ऐतिहासिक, भौगोलिक और पौराणिक महत्त्व छिप गया है। यहाँ रात की बात तो दूर, दिन में भी जाने से लोगों को डर लगता है। यहाँ वेदव्यास को उपचार के लिए ले जाने वाले महर्षि अथर्वा के शिष्यों की संततियाँ नहीं, बल्कि लूटने और यहाँ तक कि जीवन का भी हरण कर लेने वाले आधुनिक भारत के क्रूर आक्रांताओं का विचरण होता रहता है। मड़फा दुर्ग की अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ धन के लालच की भेंट चढ़ गईं। धन के लालच में ही हाथी दरवाजा, मंदिरों के गर्भगृह और ऐतिहासिक निर्मितियाँ खोद डाली गईं। यहाँ के दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य को डकैतों और अपराधियों के छिपने के सुगम ठिकानों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। विकास के संकेत भी यहाँ देखे नहीं जा सकते। यह दुर्ग, जो एक समय में अजेय था, अजेय आज भी है, मगर विकास के लिए। आज भी मड़फा दुर्ग तक जाने के लिए पगडंडियाँ ही हैं, जो मानपुर, कुरहम या खमरिया गाँव से होकर जाती हैं। मड़फा दुर्ग की यह दयनीय त्रासदी है, जो अधूरेपन के अपने दर्द को देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा के समय से आज तक बखान रही है। कालंजर का दुर्ग पर्यटन के विश्व-स्तरीय मानचित्र पर है, मगर मड़फा आज भी उपेक्षित है। मड़फा दुर्ग को आज की कथाओं से उबारकर अतीत की कथाओं तक ले जाने के लिए प्रयास अपेक्षित हैं और इन प्रयासों के लिए मड़फा का अजेय दुर्ग आज विजित होने की प्रत्याशा में कृशकाय होकर भी खड़ा है।
डॉ. राहुल मिश्र



(नगरपालिका परिषद्, हटा, जनपद- दमोह, मध्यप्रदेश द्वारा प्रकाशित और डॉ. एम.एम. पांडे द्वारा संपादित बुंदेली दरसन- 2017 में प्रकाशित)

Sunday, 15 January 2017

बरवा सागर




बरुआ सागर
प्राकृतिक सौंदर्य और शौर्य से परिपूर्ण एक नगर


वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की नगरी झाँसी से मानिकपुर की ओर जाने वाली सवारी गाड़ी के स्टेशन से रवाना होते ही अधिकांश यात्रियों के अंदर एक नए इंतजार को उपजते देखा जा सकता है। यह इंतजार सफ़र खत्म होने का नहीं है। यह इंतजार झाँसी के बाद आने वाले ओरछा स्टेशन से गाड़ी के आगे बढ़ते ही अपने चरम पर पहुँच जाता है। बेतवा नदी के पुल पर दौड़ती गाड़ी से उपजने वाली तेज आवाजें रेलगाड़ी के कोच में बरबस शुरू हो जाने वाली हलचलों को सुर दे देती हैं और बरुआ सागर स्टेशन पर गाड़ी के खड़े होते न होते दौड़ शुरू हो जाती है। झाँसी से भले ही भरपेट खाकर चले हों, मगर बीस-इक्कीस किलोमीटर के सफर में ही इतनी तगड़ी भूख उपज जाना कि दौड़ लगानी पड़ जाए, स्वयं में रोमांचित कर देने वाला है। स्टेशन पर बने चाय-पानी के स्टॉल में अच्छी-खासी भीड़ जमा हो जाती है। कोई पेड़े, तो कोई समोसे और कोई सब्जी-पूड़ी खा रहा होता है, या फिर खरीदकर ले जा रहा होता है। प्लेटफार्म पर सब्जीवालियों की लंबी कतार अलग आकर्षण रखती है। अदरख और कच्ची हल्दी से लगाकर सभी किस्म की सब्जियाँ यहाँ पर उपलब्ध हैं। अमरूद और मूँगफली के देशी स्टॉल भी कम नहीं होते हैं। विक्रेता महिलाओं की सुमधुर मिश्रित आवाजें गूँजती रहती हैं। अदरख ले लो अदराख...., अमरूद ले लो ताजे-मीठे आमरूद....। लोग समय का सदुपयोग करते नजर आते हैं। जल्दी-जल्दी सौदा पटाने और ढेर सारी सब्जियाँ खरीद लेने की होड़ नजर आती है। रेलगाड़ी के रुकने से लगाकर उसके रवाना होने तक की अवधि में किसने कितनी सब्जी खरीद ली, कितना जलपान कर लिया, जैसे विषय गाड़ी के रवाना होने के साथ ही क्षणिक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। लोगों के लिए अदरख और कच्ची हल्दी की खरीददारी ज्यादा रोमांचकारी होती है; उसी तरह, जैसे बरुआ सागर के पेड़े खाकर मानो संसार के सर्वोत्कृष्ट मिष्ठान्न को उदरस्थ कर लेने की सफलता से सुख की अनुभूति होती है। पुराने तरीके की बनी स्टेशन की इमारत और सारा स्टेशन परिसर गाड़ी के आगमन के साथ ही भागमभाग और चहल-पहल से भर जाता है। मानिकपुर की ओर से आने वाले रेलयात्रियों के साथ भी यही सब घटता है। रेलगाड़ी जाने के बाद स्टेशन में कैसी उदासियाँ पसरती होंगी और दूसरी गाड़ी के आने के इंतजार की घड़ियाँ कैसे गिनी जाती होंगी, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। दूसरे छोटे स्टेशनों से इतर बरुआ सागर स्टेशन पर कुछ अलग ही परिवेश बन जाता है, इस कारण कल्पनाओं को उड़ान भरने के लिए पंख मिल जाते हैं। स्टेशन के बाहर इस कस्बे का जीवन कैसा होगा, कई बार मन में प्रश्न उपजते हैं। आखिर इस छोटे-से कस्बे में सागर कहाँ से आ गया? अगर सागर है भी, तो कैसा है? लगता है कि जिसने बरुआ नदी में बने बाँध को सागर नाम दिया होगा, उसने शायद सागर देखा ही नहीं होगा, इसीलिए उस विशालकाय ताल को सागर मान लिया। ऐसा भी हो सकता है कि बुंदेलखंड की पथरीली जमीन पर, जहाँ जल का संकट अपना विकराल रूप दिखाने में पीछे नहीं रहता, वहाँ जल-प्रबंधन के ऐसे वृहदाकार निर्माण के प्रति आस्था ने सागर नाम दे दिया हो।

बरुआ सागर कस्बे का नाम बेतवा नदी की सहायक बरुआ नदी पर बने बाँध या वृहदाकार तालनुमा सागर के कारण पड़ा है। बरुआ सागर ताल का क्षेत्रफल लगभग एक हजार एकड़ का है। बुंदेला शासकों द्वारा स्थापित धार्मिक-ऐतिहासिक नगरी ओरछा के प्रतापी शासक राजा उदित सिंह ने सन् 1705 से 1735 के मध्य इस ताल का निर्माण कराया था। इस ताल के निर्माण का शिल्प भी अद्बुत है। आम जनता के लिए ताल का उपयोग सहज और सुलभ हो सके, इस हेतु तालाब में घुमावदार सीढ़ियाँ बनी हैं। ताल पर बना चौड़ा तटबंध पुल का काम भी करता है। ताल में जल-प्रबंधन के साथ ही जल के उच्च स्तर पर पहुँचने पर जल निकास की व्यवस्था भी है। लगभग नब्बे वर्ष पूर्व भीषण बाढ़ ने जल निकासी व्यवस्था को नष्ट कर दिया था, फिर भी यह ताल यहाँ के लोगों के लिए उपयोगी है। खेती के लिए जल संसाधन की उपलब्धता के कारण यहाँ पर खेतों में खूब हरियाली नजर आती है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित केन-बेतवा गठजोड़ परियोजना में बरुआ सागर ताल भी शामिल है और इस परियोजना के माध्यम से ताल तक जल पहुँचाने की योजना है।
बरुआ सागर के किनारे पर ऊँची समतल पहाड़ी पर किला भी है। इस किले का निर्माण भी ओरछा के राजा उदित सिंह द्वारा 1689 से 1736 के मध्य कराया गया था। किले की प्राचीर से बरुआ सागर का सुंदर नजारा और चारों तरफ पसरी हुई हरियाली बरबस ही मन को मोह लेती है। यहाँ की अनूठी प्राकृतिक सुंदरता और पठारी भूमि में पसरे धरती के सौंदर्य से अभिभूत होकर ही शायद बुंदेला शासकों ने इस किले को अपना ग्रीष्मकालीन किला बना लिया था। गर्मी के दिनों में वे यहीं पर प्रवास करते थे। संभवतः इसी कारण आज भी बरुआ सागर को बुंदेलखंड की शिमला नगरी भी कहा जाता है। बुंदेला शासकों के यहाँ आने के पहले इस इलाके में आबादी नहीं रही होगी, या बहुत कम संख्या में रही होगी, इस कारण बुंदेला शासकों को किले और ताल के निर्माण कार्य के लिए ओरछा से कामगारों को लाना पड़ा होगा। लगभग 47 वर्षों तक यहाँ पर चले निर्माण कार्य के पूर्ण हो जाने के बाद कामगारों के परिवार यहीं पर बस गए। इसी कारण यहाँ बसे अधिकांश लोग उन कामगारों के वंशज हैं, जो बरुआ सागर और किले के निर्माण हेतु यहाँ लाए गए थे। इनके पास इसी कारण बरुआ सागर से जुड़ी तमाम लोक-प्रचलित कथाएँ भी हैं।
बरुआ सागर की आबादी से लगभग ढाई किलोमीटर पहले एक ऊँचे टीले पर लगभग पाँच-छह फीट ऊँची चहारदीवारी के अंदर लाल बलुए पत्थरों से निर्मित लगभग पैंसठ फीट ऊँचा मंदिर है। इसे जरा का मठ (जरकी मठ) के रूप में जाना जाता है। लोक मान्यताएँ इस मंदिर को भाई-बहन का मंदिर मानती हैं। ऐसी कथा प्रचलित है कि बहन के जिद करने पर भाई ने इस मंदिर को एक रात में बनाकर तैयार कर दिया था। इस मंदिर में शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। यह मंदिर चंदेलकालीन है और चंदेलों के मांडलिक प्रतिहार शासकों द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। अपने स्थापत्य के कारण यह मठ ऐतिहासिक महत्त्व का है। पूर्वाभिमुख मठ में गर्भगृह, फिर अंतराल और फिर मुखमंडप है। मुखमंडल भग्नावस्था में है, जबकि मुख्य मंदिर के उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित भग्न छोटे मंदिरों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मुख्य मंदिर के चारों ओर चार छोटे-छोटे मंदिर रहे होंगे। मंदिर की ऊँचाई या विमान के साथ ही चार छोटे-छोटे मंदिरों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मंदिर पंचायतन शैली का है। मंदिर का गर्भगृह आयताकार है। आयताकार चौक प्रायः शेषशायी विष्णु या सप्तमातृका के मंदिरों में होती हैं। शेषशायी विष्णु की मूर्ति यहाँ नहीं है, मगर मंदिर के नाम से स्पष्ट होता है कि यह मंदिर शक्ति-साधना का केंद्र रहा होगा। श्री महाकाली अष्टोत्तर सहस्रनामावली में श्लोक है-
विद्याधरी वसुमती यक्षिणी योगिनी जरा ।
राक्षसी  डाकिनी  वेदमयी  वेदविभूषणा ।।26।।
महाकाली का एक नाम जरा भी है, इस तरह शाक्त-साधना के साथ इस मंदिर के संबंध का प्रमाण मिलता है। मंदिर का प्रवेश द्वार सुसज्जित है। इसमें चार पंक्तियों में नर्तकियों, अष्ट दिग्पालों, वाराहियों और द्वारपालों के साथ ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश,नरसिम्हा, लक्ष्मी-नारायण, सूर्य की प्रस्तर पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ हैं। द्वार के दोनों और गंगा और यमुना की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के शिखर का एक तिहाई हिस्सा टूटा हुआ है, जिसका जीर्णोद्धार कराया गया प्रतीत होता है। संभवतः बरुआ सागर और किले के निर्माण के दौरान बुंदेला शासकों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया होगा। बरुआ सागर के समीप ही घुघुआ मठ भी है। यह मठ भी चंदेलकालीन है और पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर नक्काशी को यहाँ पर भी देखा जा सकता है। इस मठ में चार दरवाजे हैं। तीन दरवाजों पर गणेश की प्रतिमाएँ हैं और चौथे दरवाजे पर दुर्गा की प्रतिमा है। यह मंदिर शैव-साधना का केंद्र रहा होगा, ऐसा माना जा सकता है।
स्थापत्य की इन बेजोड़ निर्मितियों के अतिरिक्त बरुआ सागर में प्राकृतिक निर्मितियाँ भी हैं। इनमें स्वर्गाश्रम प्रपात प्रमुख है। 1985 के आसपास इस स्थान पर चण्डी स्वामी शरणानंद जी सरस्वती द्वारा एक आश्रम का निर्माण कराया गया था। तब से यह स्थान पर्यटकों के लिए ही नहीं, वरन् श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। चारों तरफ फैली हरियाली, विभिन्न प्रकार के वृक्ष और उनकी शीतल छाया में कल-कल निनाद करता प्रपात का औषधियुक्त जल तन और मन, दोनों को सुख देता है। इस प्रपात के निकट तीन कुंड हैं, जिनमें इसका जल संग्रहीत होता है। प्रपात का जल गंधकयुक्त होने के कारण औषधीय गुणों से युक्त है और अनेक व्याधियों के उपचार हेतु लोग इस जल का उपयोग करते हैं। आश्रम के निकट ही हनुमान गुफा नामक एक प्राकृतिक निर्मिति है, जिसमें हनुमान जी की मशक स्वरूप प्रतिमा विराजमान है। यहाँ पर विभिन्न पर्वों में श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। गर्मी की ऋतु में यहाँ पर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। दूर्वा का विशाल उद्यान भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
बरुआ सागर, घुघुआ मठ, जरा का मठ और स्वर्गाश्रम प्रपात बुंदेले और मराठों के संघर्ष के गवाह भी हैं। सन् 1744 में यहाँ पर बुंदेले और मराठों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, जिसमें रानोजी सिंधिया के पुत्र और महाराजा माधोजी सिंधिया के अग्रज ज्योति भाऊ शहीद हुए थे। युद्ध के समापन के बाद पेशवा ने आदेश दिया था कि बरुआ सागर से वसूली जाने वाली लगान से दस हजार सालान का भुगतान शहीद ज्योति भाऊ की पत्नी को किया जाए। आश्चर्यजनक तरीके से यह भुगतान एक सौ ग्यारह वर्षों तक ग्वालियर दरबार को होता रहा। ज्योति भाऊ की बेवा के गुजर जाने के बाद यह रकम उनके परिवार के दूसरे लोगों को मिलती रही। सन् 1855 में, जब झाँसी पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया, तब अंग्रेज हुक्मरानों ने इसे रोकने की कार्यवाही की। अंग्रेजों ने आदेश जारी किया कि अधिकार के रूप में इस धनराशि का पाने का हक ग्वालियर घराने को नहीं है, बशर्ते कृपापूर्वक इसका भुगतान किया जा सकता है। लगभग एक सौ ग्यारह वर्षों तक बरुआ सागर की लगान से ग्वालियर दरबार अपनी जेबें भरता रहा।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और उनके पति गंगाधर राव को भी बरुआ सागर से बहुत लगाव रहा है। गंगाधर राव तो अकसर अपना समय यहीं पर गुजारा करते थे। गंगाधर राव के निधन के उपरांत झाँसी का राज्य राजनीतिक अस्थिरता से घिर गया। इसका लाभ उठाकर ओरछा के प्रधानमंत्री नाथे खाँ ने बरुआ सागर पर कब्जा करने की कोशिश की। उसने बरुआ सागर पर कब्जा भी कर लिया और आगे बढ़कर झाँसी के किले को भी घेर लिया। बाद में रानी झाँसी की सूझबूझ और पराक्रम के कारण नाथे खाँ को वहाँ से भागना पड़ा। रानी झाँसी ने अपने पिता मोरोपंत तांबे के नेतृत्व में चार सौ सैनिकों की फौज भेजकर बरुआ सागर को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। जिस समय रानी झाँसी अंग्रेजों से संघर्ष कर रही थीं, उस समय बरुआ सागर के आसपास के इलाके में डाकू कुँवर सागर सिंह का आतंक हुआ करता था। वह रानी झाँसी के पराक्रम से इतना प्रभावित हुआ, कि अपने सारे साथियों के साथ रानी झाँसी की फौज में शामिल हो गया। उन दिनों बरुआ सागर क्रांति की ज्वाला से धधक रहा था। अंग्रेजों को जितना खतरा झाँसी में महसूस होता था, उससे कम खतरा बरुआ सागर में महसूस नहीं होता था। इसी कारण अंग्रेजों की तमाम गुप्तचर एजेंसियाँ यहाँ पर सक्रिय रहती थीं। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से लगाकर देश की आजादी तक बरुआ सागर स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ रहा। जिस समय देश के विभिन्न हिस्सों में छापाखानों में समाचारपत्र छपा करते थे और स्वतंत्रता सेनानियों के पास भेजे जाते थे, उस समय बरुआ सागर में रातों-रात हस्तलिखित समाचार पत्र तैयार किए जाते थे और रातों-रात ही उनका वितरण आसपास के इलाकों में, शहरों में किया जाता था। वितरण करने वाले स्वाधीनता सेनानी रात में पत्र लेकर निकलते थे और सुबह होने के पहले ही पत्र बाँटकर वापस आ जाते थे। बरुआ सागर से चलने वाली इस क्रांतिकारी गतिविधि ने अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी। इस काम को करने वाले सेनानियों को तलाश पाना अंग्रेजों के लिए बहुत कठिन था। अंग्रेजों के गुप्तचर बरुआ सागर में अपना डेरा डाले ही रहते, और क्रंतिकारी अपना काम बखूबी कर ले जाते। अनेक अंग्रेज अधिकारियों ने अपने संस्मरणों में बरुआ सागर का इसी कारण खूब जिक्र किया है।
जाने-माने रंगकर्मी, नाट्य-समीक्षक, समालोचक, पत्रकार, कवि, अनुवादक और शिक्षक पद्मश्री नेमिचंद्र जैन का बचपन बरुआ सागर में ही गुजरा है। वृंदावनलाल वर्मा की रचनाओं में बरुआ सागर का सौंदर्य निखरता है। और भी तमाम कवि, साहित्यकार, इतिहासकार; चाहे वे विदेशी हों, या देशी हों, बरुआ सागर उनके लिए रोमांच से भरा रहा है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और यहाँ के कण-कण में बसी अतीत की गाथाएँ उन्हें अपनी खींचती रही हैं।
बरुआ सागर के स्टेशन में रेलगाड़ी के आते ही अचानक बढ़ जाने वाली चहल-पहल ही केवल इसकी पहचान नहीं है। यहाँ की अनूठी प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ की ऐतिहासिक विरासत न केवल शासकों को; वरन् जिज्ञासुओं को, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। यह अलग बात है कि शिमला जैसे बहुचर्चित और महँगे शहर के आकर्षण में हम अपने बुंदेलखंड के शिमला से भी खूबसूरत इलाके को विस्मृत कर बैठे हों।
बरुआ सागर के स्टेशन में सब्जियाँ, मूँगफली और अमरूद बेचती महिलाएँ आत्मसम्मान के साथ जीने का यत्न करती नजर आती हैं। रानी झाँसी ने प्रण किया था कि अपने जीते जी अपनी झाँसी नहीं दूँगी। उनका आत्मसम्मान, उनका आत्मगौरव, उनका पराक्रम, उनका शौर्य यहाँ कण-कण में, जल की हर-एक बूँद में आज भी बसता है। इसलिए गरीबी और जीवन जीने की विकट जद्दोजहद ने यहाँ की महिलाओं को लाचार-बेबस नहीं बनाया है। यहाँ से गुजरने वाले यात्रियों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि महिलाएँ सिर पर वजनी टोकरी उठाए सुबह से देर शाम तक गाड़ियों में भाग-भागकर सब्जियाँ, मूँगफली बेचती क्यों नजर आती हैं? यह इस धरती का गुण-धर्म है, यहाँ की पहचान है। अपने अतीत के गौरव से गर्वोन्नत बरुआ सागर से गुजरते हुए इस पुण्यश्लोका धरा को प्रणाम कर लेने का मन होता है। 



डॉ. राहुल मिश्र 

(बुंदेली दरसन- 2016, अंक-09, प्रकाशक- नगरपालिका परिषद, हटा, जिला- दमोह, संपादक- डॉ. एम.एम. पाण्डे)

Saturday, 19 April 2014

बुंदेलखंड के अप्रतिम इतिहासकार और साहित्यसेवी : राधाकृष्ण बुंदेली


बुंदेलखंड के अप्रतिम इतिहासकार और साहित्यसेवी 
राधाकृष्ण बुंदेली
बाँदा शहर के चौक बाजार की ओर बलखंडीनाका की तरफ से चलने पर कापी-किताबों की छोटी-सी दूकान- विजय पुस्तक भंडार। यहाँ पर पुरानी किताबें बेची और खरीदी जाती थीं। विजय पुस्तक भंडार की एक और पहचान राधाकृष्ण बुंदेली के नाम से भी कायम थी। इस छोटी-सी दूकान में साहित्यकारों, शोध छात्र-छात्राओं का और अलग-अलग विषयों के जिज्ञासुओं का दिन-दिनभर जमावड़ा लगा रहता था। कभी कोई किताबें खरीदने या बेचने आ जाता तो उसका काम निबटाकर फिर से साहित्यचर्चा शुरू हो जाती। विजय पुस्तक भंडार में अकसर विदेशी पर्यटक भी बैठे नजर आ जाते।
विजय पुस्तक भंडार की रोजमर्रा की जिंदगी में यह दृश्य कब से कायम है, मेरे लिए यह बता पाना बहुत कठिन है। क्योंकि अपने बचपन से मैंने हमेशा इस क्रम को देखा है। पढ़ाई के दिनों में किताबें लेने के लिए हमलोग भी वहाँ पहुँच जाते थे। बाद में, जब बुंदेली साहित्य, संस्कृति से जुड़ाव शुरू हुआ तो साहित्यचर्चा में शामिल होने लगे। संरक्षक के रूप में, मार्गदर्शक के रूप में राधाकृष्ण बुंदेली की नसीहतें, बातें बहुत प्रभावित करतीं। कभी कोई बुंदेली कहानी, बुंदेली लोकगीत या इतिहास का कोई प्रसंग बुंदेली जी से सुनने को मिल जाता तो वह हमेशा-हमेशा के लिए याददाश्त में बैठ जाता। ऐसे ढेरों प्रसंग, कहानियाँ-किस्से और लोकगीत हमारे लिए प्रेरणास्रोत बन गए। यहीं से बुंदेलखंड के इतिहास, तहजीब और लोकरंग को शब्द देने की प्रेरणा मिली। राधाकृष्ण बुंदेली हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने, जिन्होंने बुंदेली माटी के प्रति भावनात्मक लगाव का बीज रोपा। ऐसा महसूस करना मेरे लिए आश्चर्य से भरा हुआ नहीं है कि मेरे जैसे कई युवाओं को प्रेरणा बुंदेली जी से ही मिली होगी।
राधाकृष्ण बुंदेली बुंदेलखंड की माटी के जमीन से जुड़े साहित्यकार, इतिहासकार थे। इस कारण बुंदेलखंड की तहजीब को, यहाँ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखने का उनका नजरिया एकदम अलग था। सामान्य रूप से इतिहास का अध्ययन ऐसा होता है, जिसमें संवेदनात्मक, भावात्मक अनुभूति नहीं होती है। बुंदेली जी की इतिहास-दृष्टि इसके विपरीत थी, इसके कारण उनके द्वारा रचे गए विविध लेखों में बुंदेलखंड की ऐतिहासिक विरासत की जानकारी भावनात्मक रूप से ऐसा घनिष्ठ जुड़ाव कायम करने की सामर्थ्य रखती है, जो उनके लेखन कौशल को अद्भुत वैशिष्ट्य प्रदान कर देती है।
बुंदेलखंड के प्रत्येक क्षेत्र, विविध जनपदों में भाषाई विविधता अनूठे किस्म की है। राधाकृष्ण बुंदेली का भाषाई विविधता पर अध्ययन भी उत्कृष्ट था। उन्होंने बुंदेलखंड के विविध क्षेत्रों की बोलियों के साम्य-वैषम्य का अध्ययन किया, उन्हें प्रकाश में लाने का कार्य किया। वे बुंदेली बोलियों का व्यवहार भी बड़े रोचक ढंग से करते थे। बातों के दौरान अक्सर अलग-अलग बोलियों का यथावत् और स्पष्ट प्रयोग सुनकर क्षेत्र-विशेष के प्रति अलग-सा आकर्षण पैदा हो जाता था। विविध बोलियों का व्यवहार करते हुए अक्सर वे चिंतित हो जाते थे। खड़ीबोली हिंदी के प्रयोग और अंग्रेजी के प्रयोग के माध्यम से स्वयं को शिष्ट और पढ़ा-लिखा प्रदर्शित करने के प्रयासों में अपनी भाषाई पहचान के अस्तित्व को मिटाने की नीयत उन्हें बहुत चिंतित करती थी। हमलोगों से वे अक्सर पूछते कि तुम लोगों को कितने प्रकार की बुंदेली बोलियाँ आतीं हैं। बाद में नसीहत भरा संदेश, कि बुंदेली बोलियों को व्यवहार में रखो, उनमें साहित्य लिखो, कहानियाँ लिखो, आदि।
राई, आल्हा, ढिमरियाई, कछियाई, दादरा, सोहर और ऐसे ही तमाम लोकगीतों का सस्वर पाठ करते राधाकृष्ण बुंदेली की चिंता लोकगीतों की पुरातन परंपरा के सिमटते जाने पर भी मुखर हो उठती थी। बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान का यह बहुत बड़ा पक्ष है। कुछ विशेष प्रायोजित आयोजनों के अतिरिक्त इन विधाओं का व्यवहार-लोक सिमटता जा रहा है। सहजता के स्थान पर प्रदर्शन हावी होता जा रहा है। इनके संरक्षण के लिए और इन विधाओं के कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए राधाकृष्ण बुंदेली सदैव प्रयासरत रहे। बुंदेलखंड के लोकगीतों पर उन्होंने कई शोध-छात्रों का निर्देशन भी किया।
बदलती जीवन-शैली, आधुनिकता के प्रभाव और लोकसंस्कृति को पिछड़ेपन की निशानी समझने की मानसिकता के कारण बुंदेली संस्कृति और बुंदेलखंड के गौरवपूर्ण अतीत से समाज की बढ़ती दूरियों को बुंदेली जी ने शिद्दत से महसूस किया। उन्होंने बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विशिष्टताओं को देश-दुनिया के सामने लाने और समाज को अपनी तहजीब, अपने इतिहास से जोड़ने के लिए सर्वाधिक लोक-प्रचलित माध्यम- फिल्म का उपयोग किया। इसके लिए उन्होंने अपने संसाधनों से, अपने अनथक प्रयासों से कालंजर के ऊपर लंबी फिल्म का निर्माण किया।
सन् 1986 में उन्होंने सीमित तकनीकी संसाधनों का उपयोग करके कालंजर दर्शन नामक फिल्म निर्माण की शुरुआत की। इसमें विश्वविख्यात ऐतिहासिक-पौराणिक दुर्ग कालंजर की चालीस किलोमीटर की परिधि में आने वाली ऐतिहासिक धरोहरों का फिल्मांकन किया। राधाकृष्ण बुंदेली ने पटकथा लेखन, संवाद लेखन, पात्र-चयन और निर्देशन आदि दायित्वों का स्वयं निर्वहन किया। तकनीकी के विविध प्रयोगों के माध्यम से फिल्म को रोचक और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए अध्ययन भी किया और नवीन अनुसंधान भी किया। कालंजर के आसपास की ऐतिहासिक धरोहरों के साथ ही यहाँ पर प्रचलित धार्मिक मान्यताओं, सांस्कृतिक विशिष्टताओं और भौगोलिक विशिष्टताओं को पूरे यथार्थ के साथ, समग्रता के साथ उन्होंने फिल्माया। लगभग नौ घंटे की यह फिल्म आठ वर्षों के अनथक परिश्रम के बाद बनकर तैयार हुई। इस फिल्म में मड़फा, रौली गोंडा, रसिन और पाथर कछार समेत अनेक दुर्गम स्थानों का फिल्मांकन हुआ है। उस दौर में इन दुर्गम स्थानों तक अकेले पहुँच पाना ही बहुत कठिन हुआ करता था। डाकुओं के अलावा सड़क मार्ग की अनुपलब्धता, लोगों की दूषित मानसिकता और प्राकृतिक आपदाएँ आदि अनेक बाधाओं से जूझते हुए बुंदेली जी ने फिल्म निर्माण पूरा करके नए लोगों को प्रेरणा देने का कार्य भी किया और बुंदेलखंड की सच्ची सेवा भी की। कालंजर दर्शन फिल्म ने कालंजर को विश्व सांस्कृतिक धरोहर में स्थान दिलाने की दिशा में सार्थक योगदान दिया।
कालंजर के अतिरिक्त अन्य स्थानों के संरक्षण, देखभाल और जन-जागरूकता हेतु बुंदेली जी के प्रयास अनवरत जारी रहे। वर्ष 2010 में चित्रकूट के चर गाँव के नजदीक स्थित गुप्तकालीन और भारशिव शासकों द्वारा निर्मित सोमनाथ मंदिर की उनकी यात्रा के साथ हमलोगों की सुंदर-रोचक यादें जुड़ी हुई हैं। सत्तर वर्ष की उम्र में अपनी शारीरिक विवशताओं को दरकिनार करते हुए हमारे अनुरोध पर उन्होंने सोमनाथ मंदिर चलने की स्वीकृति दे दी। दिन-भर के कार्यक्रम में उन्होंने मंदिर के स्थापत्य के बारे में, मंदिर के निर्माण के काल निर्धारण के बारे में और मंदिर से जुड़े अनेक साक्ष्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी और लगभग एक घंटे के वृत्तचित्र के निर्माण का हमारा संकल्प सफल हो सका, सार्थक हो सका। वृत्तचित्र निर्माण के बाद सोमनाथ मंदिर को राष्ट्रीय पुरातात्त्विक धरोहर के रूप में संरक्षित किए जाने हेतु हमारे अभियान को उनका संरक्षण, मार्गदर्शन जीवन पर्यंत प्राप्त होता रहा।
राधाकृष्ण बुंदेली ने आजीवन बुंदेलखंड की सेवा की और निस्वार्थ भाव से, निष्काम भाव से उनकी सेवा उन तमाम लोगों के लिए मार्गदर्शक बन गई, जिनके लिए शोशेबाजी, दिखावेबाजी करके यश प्राप्ति की या अर्थ प्राप्ति की लिप्सा पहला महत्त्व रखती है। बुंदेली जी को बुंदेली विकास संस्थान, बसारी, छतरपुर के द्वारा सन् 2011 में राव बहादुर सिंह बुंदेला सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त थियोसोफिकल सोसायटी, बुंदेलखंड टीवी एवं फिल्म प्रोडक्शन यूनिट, संस्कार भारती, बुंदेलखंड अमृत महोत्सव सम्मान आदि से सम्मानित किया गया। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा, कालंजर शोध संस्थान, अमर शहीद क्रांतिकारी मंगल पांडे फाउंडेशन, नौटंकी कला केंद्र, मंडल समाचार पत्र संपादक संघ, इंटैक और राष्ट्रीय एकीकरण अनुभाग सहित अनेक संस्थाओं और संगठनों ने उन्हें विभिन्न सम्मानों/पुरस्कारों से सम्मानित किया।
अपने जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने व्यास ऋषि के जन्म-स्थान- अदरी, चिल्ला (बाँदा) और सोमनाथ मंदिर, चर, चित्रकूट की खोज में अमूल्य योगदान दिया। हम युवाओं के लिए उनकी प्रेरणा, उनकी कर्मठ जीवनी-शक्ति अमूल्य है। बिना किसी लालसा के निष्काम भाव से बुंदेलखंड की सेवा करने का जो भाव बुंदेली जी के जीवन में, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में देखने को मिलता है, वह अत्यंत दुर्लभ है। विशेषकर आज के भौतिक युग में, टूटते-बिखरते मानवीय मूल्यों के दौर में अपनी माटी के लिए समर्पण का भाव बहुत कम देखने को मिलता है। विजय पुस्तक भंडार के माध्यम से व्यवसाय की अपेक्षा समाजसेवा को महत्त्व देते हुए, वंचितों-गरीबों को शिक्षा के लिए अवसर उपलब्ध कराते हुए वहीं से बुंदेलखंड के नेह-प्रेम की अलख जगाने वाले राधाकृष्ण बुंदेली का व्यक्तित्व और उनका कृतित्व अनूठा था। विजय पुस्तक भंडार एक प्रतिष्ठान मात्र नहीं, शक्ति का, संप्रेषण का, जागृत चेतना का केंद्र था। हम सभी के लिए यह गौरव की बात है कि हमें बुंदेली जी का संरक्षण प्राप्त हुआ और बुंदेली माटी से भावनात्मक जुड़ाव जोड़ पाने का एक आयाम मिला। हमारे बीच से बुंदेली जी का जाना एक ऐसे निर्वात का सृजन कर गया है, जिसकी भरपाई की संभावना कोसों दूर तक नजर नहीं आती। उनकी उपस्थिति का अहसास मात्र शेष है, जो असीमित शांति देता है, प्रेरणा देता है और उनके सपनों को साकार करने हेतु संघर्ष की शक्ति देता है। उनकी स्मृतियों को कोटिशः नमन।
डॉ. राहुल मिश्र
{बुंदेली बसंत- 2014, बसारी, छतरपुर (मध्यप्रदेश) में प्रकाशित}