Saturday, 24 September 2016

लदाख की थङ्का चित्रकला

लदाख की थङ्का चित्रकला

हिमालय के ऊँचे-ऊँचे पहाड़, आसमान को छूते हुए। पहाड़ों की चोटियों पर चमकती सफेद बर्फ। साफ, धुले हुए जैसे दिखने वाले नीले गगन में तैरते रूई के गोलों जैसे बादलों के झुंड। सूरज की रोशनी में लालिमा से भरी बादलों की टुकड़ियाँ। प्रकृति के इस मनमोहक नजारे को लदाख की धरती पर देखा जा सकता है। लदाख में प्रचलित चित्रकलाओं में प्रकृति के ऐसे नज़ारे देखने को मिलते हैं। लदाख धर्म और साधना की भूमि रही है, इसलिए यहाँ की अधिकांश चित्रकला भी धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाले चित्र इस क्षेत्र में बहुत पुराने समय से प्रचलित रहे होंगे, इसलिए लदाख की गोनपाओं में सुशोभित पट्टचित्र, जिन्हें स्थानीय भाषा में थङ्का कह जाता है, उनमें ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य को देखा जा सकता है। मोटे कपड़े में बने हुए बुद्ध, बोधिसत्व, तांत्रिक देवी-देवताओं और तांत्रिक मंडलों आदि के चित्रों को थङ्का कहा जाता है। अगर अतीत में उतरकर देखें, तो इन पट्टचित्रों या थङ्काओं में लदाख के अतीत की झाँकी देखने को मिलती है।
लदाख के इस प्राकृतिक सौंदर्य के बीच जीवन की जटिलता भी कम नहीं है। आवागमन के साधनों की, संसाधनों की और दैनिक जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं की कमी यहाँ के जीवन को जटिल बना देती है। जब जीवन कठिन हो जाता है और जीवन की कठिनाइयों से जूझने के लिए कोई बाहरी रास्ता नज़र नहीं आता, तब एक ही रास्ता बचता है- आस्था का। अतीत में, जब जीवन की जटिलताएँ बहुत ज्यादा थीं, उस समय आस्था भी प्रबल थी। इसी कारण पूजा और साधना के लिए विविध माध्यमों का विकास हुआ। साधकों और तपस्वियों के लिए साधना के अलग रूप हो सकते हैं, मगर आम जनता के लिए उन कठिन रास्तों को अपनाना कठिन होता है। शायद इसी जरूरत ने आम जनता के लिए आस्था के फलने-फूलने के माध्यमों का विकास किया। बौद्ध धर्म में इसी कारण मूर्तियों, स्तूपों, चित्रों, देवालयों और मठों को पूजा एवं साधना में विशेष स्थान मिला। संस्कृत में श्लोक है-
संबुद्धचित्र-  मूर्त्यादिस्तूपसद्धर्मसंमुखः ।
पुष्पैः धूपैः पदार्थैश्च यथाप्राप्तैः सुपूजयेत् ।।
अर्थात्, भगवान् बुद्ध के चित्र, मूर्ति, स्तूप आदि सद्धर्म के प्रतिरूप हैं। इनके समक्ष अपनी भक्ति-भावना को प्रकट करना ही सच्चा धर्म है। इसलिए पुष्प, धूप और अन्य पूजा-सामग्री के साथ पूरी आस्था के साथ इनकी पूजा करनी चाहिए। इससे पुण्य का लाभ होता है। इसी कारण भगवान् बुद्ध की मूर्तियाँ, उनके चित्र और स्तूप आदि की पूजा का विशेष विधान लदाख अंचल में देखने को मिलता है। विभिन्न परंपराओं तथा शैलियों से संपन्न ये कलाएँ  बोधिप्राप्ति के लिए उपयोगी बनकर लदाख के जनजीवन में गहराई तक उतरी हुई हैं। बौद्ध धर्म में शमथ, अर्थात् मन की शांति पाने का प्रयास ही साधना के प्रथम चरण में होता है। इस प्रकार शमथ या मन की शांति ही साधना की पहली सीढ़ी है, जिसे पाने के बाद अभिज्ञा बल, अर्थात् समझने-विचारने की शक्ति प्राप्त होती है। इस अभिज्ञा बल की साधना से सम्बोधि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार सम्बोधि के स्तर तक पहुँचने के लिए साधकों को शमथ की पहली सीढ़ी चढ़नी होती है, जो मूर्ति तथा चित्रकलाओं के माध्यम से पाई जा सकती है। आचार्य दीपांकर श्रीज्ञान अतिशा ने इसी कारण शमथ की साधना हेतु मूर्ति तथा चित्रकलाओं के महत्त्व पर बल दिया है।
लदाख अंचल अपने अतीत से ही बौद्ध साधना का प्रमुख केंद्र रहा है और यहाँ पर अनेक कलाओं का विकास भी होता रहा है, जिनका महत्त्व बौद्ध धर्म की साधनाओं में, विभिन्न साधना-पद्धतियों में है। स्तूपों, मूर्तियों और भित्तिचित्रों के साथ ही लदाख अंचल में प्रचलित थङ्का चित्रकला इसी कारण अपना विशेष महत्त्व रखती है। लदाख में थङ्का चित्रकला के विकास का इतिहास भी बहुत रोचक और विविधता से भरा हुआ है। भोट भाषा में एक धर्मशासक जिग-तुल का उल्लेख मिलता है, जिन्हें भारतीय परंपरा में राजा भयजित के रूप में जाना जाता है। राजा भयजित ने एक ब्राह्मण के दिवंगत बेटे को पुनः जीवित करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर ब्राह्मण के बेटे का चित्र बनाया और ब्रह्मा जी ने उसे जीवन दिया। इस प्रकार राजा भयजित को संसार के पहले चित्रकार के रूप में जाना गया। राजा भयजित या जिग-तुल से ब्रह्मा जी ने कहा कि जिस तरह पर्वतों में मेरु श्रेष्ठ है, पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, उसी तरह विभिन्न कलाओं में चित्रकला श्रेष्ठ है, इसलिए चित्रकला को प्रोत्साहित करो। इसके उपरांत ही ब्रह्मलोक के राजा और विश्वकर्मा जी ने चित्रकला की शिक्षा उपलब्ध कराई और इसके लाभ को, इससे होने वाले धर्मार्थ को जनता के लिए सुलभ कराया। चित्रकला की उत्पत्ति एवं विकास से संबंधित इस लोककथा का वर्णन बौद्ध ग्रंथ तंग्युर में मिलता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार चित्रकला का उद्भव वर्तमान बिहार के मगध राज्य में हुआ। यहाँ के राजा बिंबिसार और राजा उत्तायण घनिष्ठ मित्र थे और एक-दूसरे को बहुमूल्य उपहार भेजा करते थे। एक बार उत्तायण ने बहुमूल्य मणि बिबिंसार को भेजी। बदले में बिंबिसार ने उन्हें भगवान बुद्ध का चित्र भेजना सुनिश्चित किया। भगवान बुद्ध की अलौकिक छवि से ऐसी विलक्षण किरणें निकलने लगीं कि चित्रकारों को चित्र बनाना ही कठिन हो गया और तब भगवान बुद्ध ने कहा कि कपड़े पर पड़ रही मेरी छाया को ही रंग दो। इस तरह बने हुए चित्र को बिंबिसार ने अपने मित्रको उपहारस्वरूप भेजा और यहीं से चित्रकला की शुरुआत हुई। बौद्ध ग्रंथों में भी भगवान बुद्ध के चित्र बनाने की कला का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में विनय सूक्त, मंजुश्री मूलकल्प और समवरोदया तंत्र आदि का उल्लेख किया जा सकता है। लदाख में थङ्का चित्रकला के विकास को इन कथाओं और ग्रंथों में देखा जा सकता है।


लदाख में थङ्का चित्रकला के विस्तार की एक धारा कश्मीर से आई। कहा जा सकता है कि लदाख अंचल में चित्रकला का प्रारंभिक आगमन कश्मीर से ही हुआ। कश्मीर में हर्ष के समय से ही कुछ ऐसे चित्रकार थे, जिन्हें राजकीय संरक्षण प्राप्त था। कश्मीर में नाग शैली के साथ ही गौड़ीय और कोंकणी शैली भी प्रचलित थी, जो लदाख अंचल के निचले इलाकों में प्रचलित हुई। लदाख में थङ्का चित्रकला की दूसरी धारा तिब्बत से आई। तिब्बत में थङ्का चित्रकला की परंपरा नेपाल और चीन से पहुँची। सातवीं शताब्दी में तिब्बत के राजा स्रोंङ्-चेन-गम्पो ने नेपाल की राजकुमारी भृकुटी देवी और चीन की राजकुमारी कोंग-जोङ् से विवाह किया था। इन दोनों के साथ ही नेपाली चित्रकला शैली और चीनी चित्रकला शैली का तिब्बत में विस्तार हुआ। इस कारण दोनों रानियों को तारादेवी के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा भी प्राप्त हुई है। नेपाली और चीनी चित्रकला परंपरा मूलतः भारतीय ही थी, जो स्थान और समय के अनुरूप अपने परिवर्तित रूप में तिब्बत में विकसित हुई। ग्यारहवीं शताब्दी में तिब्बत के प्रख्यात अनुवादक लोचावा रिंचेन जङ्पो के साथ कश्मीरी चित्रकला परंपरा भी तिब्बत पहुँची। इस तरह तिब्बत में कश्मीरी, पाल, चीनी, नेपाली, मंगोलियाई और खोतानी चित्रकलाओं के संगम से एक नई चित्रकला परंपरा का उदय हुआ। तिब्बत में विकसित हुई इस चित्रकला परंपरा में दो प्रमुख पद्धतियाँ प्रचलित हुईं। इनमें मन्-रिस् चित्रकला परंपरा का विकास नेपाल की शैली के प्रभाव में हुआ। इसमें नीले, हरे और सुनहरे चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है। करमा-गरङिस् या गरचित्र परंपरा का विकास चीनी शैली से हुआ। इसमें हलके रंगों का प्रयोग होता है। तिब्बत का त्सङ् नामक स्थान थङ्का चित्रकला के अध्ययन-अध्यापन एवं निर्माण के लिए प्रसिद्ध था और यहाँ पर विकसित हुई थङ्का चित्रकला शैली को स्थान-नाम के अनुसार त्सङ्-रिस् नाम मिला। लदाख के भिक्षुगणों ने प्रायः यहीं से अध्ययन करके लदाख में त्सङ्-रिस् नामक चित्रकला शैली को विकसित किया। इस कारण लदाख में त्सङ्-रिस् थङ्का चित्रकला अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है।    
जिस समय कश्मीर सहित दुनिया के तमाम देशों में बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का अस्तित्व सिमट रहा था, उस समय तिब्बत में यह परंपरा फल-फूल रही थी। लदाख अंचल के अनेक भिक्षु और बौद्ध विद्वान ज्ञानार्जन के लिए तिब्बत जाते थे। लदाख से तिब्बत आवागमन का यह क्रम तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के आसपास अपने चरम पर था। चूँकि महायान साधना पद्धति में चित्रकला का महत्त्वपूर्ण स्थान था, इस कारण लदाख के भिक्षुओं को चित्रकला का ज्ञान अनिवार्य रूप से प्राप्त करना होता था। वे लदाख लौटते समय थङ्का चित्रों के साथ ही इनके निर्माण का ज्ञान भी अपने साथ लाए और कालांतर में लदाख में थङ्का चित्रकला की उस परंपरा का विकास हुआ, जिसे आज हम जीवंत रूप में लदाख की धार्मिक परंपराओं और रिवाजों में देखते हैं। लदाख में विभिन्न कलाओं का विकास पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में हुआ। इसी अवधि में लदाख में थङ्का चित्रकला भी विकसित हुई। लदाख की अनेक गोनपाओं में इस अवधि के थङ्का चित्रों को देखा जा सकता है। इनमें से कई थङ्का चित्र अत्यंत दुर्लभ हैं और धार्मिक महत्त्व के साथ ही यहाँ के निवासियों की कलाप्रियता को भी प्रदर्शित करते हैं।
थङ्का चित्रों को बनाना अत्यंत पुनीत और धार्मिक कार्य माना जाता है। इस कारण थङ्का चित्रकारों को बौद्ध धर्म में बताए गए शील और विनय का पालन करना अनिवार्य होता है। बदलते परिवेश में भले ही नियमों में शिथिलता आई हो, गमर आज भी तङ्का चित्रकार बड़ी सरल और विनम्र जीवन-शैली व्यतीत करते देखे जा सकते हैं। थङ्का चित्रों को बनाने के लिए जिस मोटे कपड़े का प्रयोग होता है, उसे काशिका कहा जाता है। काशी से आने के कारण ही संभवतः इसे काशिका कहा जाता है। कपड़े को चित्रांकन के लिए तैयार करने से पहले गुनगुने पानी में गोंद और चूना मिलाकर भिगोया जाता है, फिर उसे लकड़ी के बने साँचे में कस दिया जाता है। इसे धूप में सुखाने के बाद चूने का पानी छिड़ककर घिसा जाता है। कड़ी मेहनत के बाद यह चित्रांकन के लिए तैयार होता है। थङ्का चित्रों के निर्माण के लिए शास्त्रीय विधि से माप और रंगों का चयन किया जाता है। देवी-देवताओं, धर्मपालों और मंडलों के चित्र-निर्माण हेतु निश्चित माप और रंग-संयोजन होता है। माप और रंग-संयोजन के आधार पर थङ्का चित्र कई प्रकार के होते हैं। लदाख में विभिन्न प्रकार के थङ्का चित्रों को बनाने का प्रचलन है। इनमें त्सोन-थङ् थङ्का विभिन्न प्रकार के तैलीय रंगों को सफेद पृष्ठभूमि में उकेरकर करके बनाई जाती है। सेर-थङ् थङ्का में सोने की परत पर सिंदूरी रंग से चित्रण किया जाता है। ङुल-थङ् में छोन-थङ् और सेर-थङ् का मिश्रण होता है। नग-थङ् थङ्का का निर्माण सफेद कपड़े पर काले रंग की पृष्ठभूमि देकर सुनहरे रंग के साथ रंगकर किया जाता है। थग-डुब थङ्का का निर्माण सोने और चाँदी के धागों से किया जाता है। छ़ेम-डुब थङ्का का निर्माण अनेक धागों की कढ़ाई के द्वारा किया जाता है। रेशमी वस्त्र पर गोस-डु थङ्का का निर्माण होता है, जबकि लेन-देबस् थङ्का में सफेद कपड़े पर कपड़ों के रंग-बिरंगे टुकड़ों को चिपकाकर चित्राकृति दी जाती है। तैलीय रंगों के प्रयोग की सुगमता के कारण वर्तमान में त्सोन-थङ् थङ्का के निर्माण का प्रचलन देखा जा सकता है।
थङ्का निर्माण की प्रकिया में सबसे पहले खाका बनाने का काम होता है, जिसे नक्-च्यत् कहा जाता है। खाके में रंग भरने के काम को त्सोन कहते हैं। रंगों के संयोजन और उनके विस्तार को शिब-छा कहते हैं। चित्र में रंगों को गहरा करके छाया दर्शाने का काम कम-म्दंग्स (skam mdangs) कहलाता है। चित्र में सोने की जैसी चमक पैदा करने हेतु ग्जी (gzi) और सुनहरे रंग से किनारा करने के लिए सेर-च्यत् का कार्य संपन्न किया जाता है और अंत में आँखों के निर्माण स्च्यन-फस के साथ चित्र अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। बने हुए चित्र को उपयोग के लिए तैयार करने और सुरक्षित रखने हेतु सुंदर-से रंग-बिरंगे आयताकार कपड़े कोङ्-शम् में बीचोबीच सिल दिया जाता है। कपड़े के दोनों किनारों पर सुंदर नक्काशीदार बेलनाकार लकड़ी लगाई जाती है, जिस पर कपड़े को लपेटा जा सके। इस प्रकार थङ्का चित्र तैयार हो जाता है।

लदाख की धार्मिक परंपराओं में थङ्का चित्रों का बहुत महत्त्व होता है। इन्हें गोनपाओं में प्रदर्शित किया जाता है। लदाख की अनेक प्रमुख प्राचीन गोनपाओं में अनेक बहुमूल्य थङ्काएँ हैं। इनमें से कई थङ्काएँ पाँच से दस मीटर तक लंबी भी हैं। ये प्राचीन बहुमूल्य थङ्काएँ गोनपाओं के वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के समय श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ प्रदर्शित की जाती हैं। बेशकीमती थङ्काओं के साथ ही विभिन्न देवी-देवताओं, अर्हतों, धर्मपालों, तांत्रिक मंडलों की अनेक थङ्काएँ भी गोनपाओं में श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ प्रदर्शित की जाती हैं। लदाख की लोकपरंपरा में थङ्का चित्रकलाओं को जीवित-जीवंत रखने के लिए अनूठी व्यवस्था की गई है। समाज के धनी व्यक्ति अकसर गंभीर बीमारियों से बचने के लिए या किसी गंभीर बीमारी से बच जाने पर थङ्का चित्र का निर्माण कराकर गोनपा में भेंट करते हैं। इसके साथ ही अपने दिवंगत प्रियजन की आत्मा की शांति के लिए भी लोग थङ्का चित्रों का निर्माण कराते हैं और उन्हें गोनपाओं में चढ़ाते हैं। लोकपरंपरा में जीवित रहने के कारण थङ्का चित्रों के निर्माण की पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। लदाख अंचल में थङ्का चित्रकला को संरक्षित एवं सवर्द्धित करने हेतु जम्मू-कश्मीर के हस्तशिल्प विभाग द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। आजकल परंपरागत थङ्का चित्रकला के साथ चित्रांकन की आधुनिक पद्धतियों के संयोजन से चित्रांकन की नई तकनीक विकसित हुई है, जिसकी आजकल बहुत माँग है। लदाख में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को भी थङ्का चित्र बहुत प्रभावित करते हैं और वे भी अत्यंत आस्था के साथ इन्हें खरीदते हैं।
इस प्रकार लदाख अंचल में थङ्का चित्रकला अपने गौरवपूर्ण अतीत के साथ लदाख में बौद्ध धर्म की अपनी अनूठी धार्मिक पहचान को सहेजे हुए है। लदाख की थङ्का चित्रकला के माध्यम से एक ओर भारतीय चित्रकला संरक्षित है, तो दूसरी ओर यह थङ्का चित्रकला देश-दुनिया को अपने अनोखे आध्यात्मिक ज्ञान से आलोकित भी कर रही है।
कार्यकारी संपादक- नूतनवाग्धारा


      (दूरदर्शन केंद्र, लेह-लदाख द्वारा वृत्तचित्र-निर्मा एवं दिनांक 13 नवंबर, 2015 को 1800 बजे प्रसारित)
(एक तिब्बती थङ्का चित्रकार)
                   

Saturday, 20 August 2016

अपने भीतर से बाहर तक झाँकती कविताएँ : संघर्ष का छोर नहीं


अपने भीतर से बाहर तक झाँकती कविताएँ : संघर्ष का छोर नहीं

हिंदी कविता के वर्तमान में डॉ. शुभदर्शन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सन् 1978 से अब तक उनके सात कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। समय के एक लंबे विस्तार में केवल सात कविता-संग्रह; जीवन की संघर्ष-चेतना, परिवेश के यथार्थ से संलग्नता और विचारों के घनत्व के कारण ऐसा उद्वेलन पैदा कर देने वाले हैं, जिन्हें संख्याबल से नहीं, वैचारिक फैलाव के नजरिए से खास माना जाएगा। कविता की उपज संवेदनाओं के घनत्व की भूमि पर तैयार शब्दों से होती है। संवेदनाएँ रासायनिक तत्त्वों की तरह प्रयोगशालाओं में तैयार नहीं होतीं, न ही वे वातानकूलित कक्षों में अपनी उपज के लिए उचित खाद-पानी पाती हैं। ऐसा कर सकने की सामर्थ्य रखने वाले आज के वैज्ञानिक युग के चंद कलमकारों की खरपतवार-सम उपज के बीच शुभदर्शन की कविताएँ माटी की सोंधी महक लिए हुए हैं। हकीकत का गमगमाता तीखापन उनमें यक्साँ है। पेशे से पत्रकार होने के कारण शुभदर्शन के लिए उस समाज का चेहरा देखना सुलभ है, जिसे टेलिस्कोप से नहीं देखा जा सकता, जिसे कमरे की खिड़की में बैठकर कॉफी का प्याला हाथ में लिए हुए नहीं देखा जा सकता है। शुभदर्शन की कविताओं में इसी कारण एक अलग-सा अहसास है, अलग-सी चेतना है और अलग ही संघर्ष है। उनके सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह संघर्ष का छोर नहीं से पहले सन् 1999 में संघर्ष जारी है, सन् 2011 में संघर्ष बस संघर्ष और सन् 2012 में संघर्ष ममता का कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। समाज की घनी पीड़ा के बीच जीवन जीने की अभिलाषा लिए निरंतर जूझते रहने की नियति और भौतिक-अभौतिक स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार जमीन की अनुभतियाँ उनके काव्य-संग्रहों में परिलक्षित होती हैं, इस कारण उनके काव्य-संग्रहों का क्रम संघर्ष की धुरी पर बढ़ता प्रतीत होता है।
डॉ. शुभदर्शन की सद्यः प्रकाशित कृति के आत्मकथ्य में ही संघर्ष की झलक मिल जाती है। उन्होंने आत्मकथ्य को साहित्यिक अँधेरे से बगावत शीर्षक दिया है। वे बताते हैं कि अँधेरा आज हमारे सामने नहीं है, हमारे अंदर बैठ चुका है। वे लिखते हैं कि- अँधेरा आज मानवीय/नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक मूल्यों को ही अपने आगोश में लिए है, बल्कि भावी पीढ़ी का पथ-प्रदर्शक साहित्य धमनियों में भी अंधे स्वार्थ का रक्त तेजी से फैल रहा है। निष्कर्ष यह कि चापलूसों की एक पीढ़ी तैयार हो गई है। धुरंधर अपने-अपने मठ बनाए पट्ठों से मालिश कराने में व्यस्त झंडाबरदार होने का सुख भोग रहे हैं। धर्म व राजनीति की मानिंद गद्दी की परंपरा-सी बन गई है। उम्र भर चाटुकारिता का पुरस्कार मिलने/खुद अलमबरदार बनने पर वह भी आगामी पीढ़ी से यही अपेक्षा रखता है। (पृ.05) संघर्ष की यह स्थिति उस वर्ग के साथ है, जिस पर समाज को दिशा देने का भार है। अपनी गद्दी को ऊँची बनाने की कोशिशों में चापलूसी, पुरस्कार पाने की होड़ और राजनीतिक आकाओं के समक्ष नतमस्तक हो जाने की मानसिकता कीचड़ का ढेर जैसा बना रही, जिसमें गिरगिट की-सी प्रवृत्ति लिए, मौके की तलाश में बैठे साहित्य के अलमबरदार हैं। ऐसी दशा में कवि को लगता है कि- नए लोगों को ढूँढ़ना होगा, अपना नया आकाश- उकाब रहित। करनी होगी बग़ावत उकाब के पंखों से बढ़ रहे अँधेरे के ख़िलाफ़। (पृ06) कवि के ऐसे बगावती तेवर उनके संघर्ष की चेतना को उकेर देते हैं और काव्य-संग्रह अपनी शुरुआत के साथ ही ऐसे संघर्ष से पाठक को जोड़ देता है, जो संग्रह के आखिरी छोर पर एक नए संघर्ष की जमीन पाठक के मन में तैयार कर देता है, जिसका कोई छोर नहीं।
समीक्ष्य कृति में चौवन कविताएँ हैं। शुरुआत की तीन कविताएँ बहन-माँ-बाप के जरिए उस परिवार को देखने की कोशिश करती नजर आती हैं, जहाँ घर की दीवारें सारी दुनिया को अपने में कैद कर लेती हैं और सारी दुनिया घर में समा जाती है। आँख का मिजाज आदमी की उन आँखों की तासीर नापती है, जो कभी बिल्ली, कभी सियार, तो कभी लोमड़ की जैसी हो जाती हैं। बेजान लोग कविता में ऐसे बेजान लोग हैं, जो अपना वजूद खोकर नेताओं के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं। कवि लिखता है-
नेताओं की पंचायत ने/ तय कर लिया कि/ भैंस के आगे बीन बजाना बेकार है/ और यह मुहावरा रटते-रटते खुद भैंस हो गई है जनता/ कान होने के बावजूद/ नहीं सुनती समय की बीन/ रंभाती है विरोध में/ करती है जुगाली देशभक्ति के तरानों की/ जिसके इवज में बंध गई खूंटे से।। (पृ. 15)
राजनीति के वर्तमान पर दयनीयता से पूर्ण व्यंग्य समय और समाज के गहरे अन्वेषण से निकला है और जिन बेजान लोगों की तासीर को उकेरता है, उनकी एक और पहचान कविता में मिलती है। बेजान लोग किसी विवेकशील, जीवित-जागृत व्यक्ति को सह नहीं सकते हैं, और हमेशा से ही दूसरों की स्वार्थपूर्ति का साधन बनते आए हैं। कवि 1857 में पालतू साँपों के गुच्छ फेंककर घेर लिए जाने वाले देशभक्तों (पृ. 15) के हवाले से अतीत की पड़ताल भी करता है और नेता व साँप, जनता व भैंस के पर्याय में वर्तमान का अवलोकन भी तीखेपन के साथ करता है।
अरमानों की दीया बाती, देवता का बुत, क्या और कोई रास्ता नहीं, इक उम्मीद, सूखा और बदली, ख़ामोश है साथी, क्या नाम दूँ, हम लड़ेंगे साथी, निहारना सूना आकाश, मिट पाएगी भूख?, बच्चे व बीज और हारे हुए लोग जैसी कविताएँ व्यक्ति से समाज तक, अतीत से वर्तमान तक अहसासों की उन परतों को उघाड़ने का प्रयास करती नजर आती हैं, जिनमें बिखराव, टकराव, अलगाव और संत्रास के स्याह रंग भरे हुए हैं; जिनमें संघर्ष के ऐसे आयाम खुलते हैं, जिनसे बचकर निकल पाना न तो व्यक्ति के स्तर पर संभव है और न ही समाज के स्तर पर। यहाँ संस्कृति और पुरातनता के प्रतीक भी हैं, जिन्हें त्यागकर आधुनिक बनने की कवायद में अपना-सा बहुत कुछ छूट जाता है, और जिनके प्रति लगाव की सहज-स्वाभाविक स्थिति अलगाव की अनचाही (या ओढ़ी हुई) स्थितियों के कारण उपजता अवसाद उभर पड़ता है। प्रकृति के कितनी पास थी माँ, कविता में भी ऐसे ही भाव उभरते हैं। माँ के जरिए गाँव और अपने परिवेश के सुख को स्मरण करते-करते बदलाव के दुःखद पक्ष को उकेरने का प्रयास कविता में होता है। कवि लिखता है-
बनेरों पर काग नहीं/ चलित फोन/ देते हैं/ पाहुन का संदेश
तुम ठीक कहती थी मां/ पर मुझे विश्वास नहीं हुआ/ प्राचीर से देखती रही/ मेरी आत्मा/ चौराहे पर पड़ा मेरा शव/ वर्षों तक नहीं आया/ कोई गिद्ध या कौआ/ तो जाना-तुम सही थीं। (पृ. 61-62)    
कविता में एक ओर संस्कृति और परंपरा के बिखराव का दर्द है, तो वहीं दूसरी ओर विज्ञान के असर से मिटती अनूठी पहचान का दर्द भी यक्साँ है। माँ की स्मृतियाँ और पुरनिया जीवन के एकाकार हो जाने की स्थितियाँ कविता में इस तरह गुँथी हुई हैं कि प्रकृति और माँ, दोनों से बिछड़ने का दुःख एक-सा ही लगता है। प्रकृति से अलगाव ही नहीं, संबंधों के बिखरने से उपजे अवसाद की तीव्रता को आधुनिकता के साथ होने वाले संघर्ष ने इतना तीव्र कर दिया है कि कविता की प्रत्येक पंक्ति एक नई संघर्षभूमि का सृजन करती प्रतीत होती है।
जौहर तो जौहर है, एकदम अलग तासीर की कविता है, जो अतीत से वर्तमान तक स्त्री की उस नियति की पड़ताल करती है, जो इतिहास में दर्ज भी है और दर्ज नहीं भी है। अपनी आन-बान की रक्षा के लिए जौहर की आग में जान दे देने वाली नारी जरूर इतिहास में दर्ज है, मगर- नारी जीवन का आईना/ नहीं है इतिहास/ जीवन भर समस्याओं से जूझना/ आज भी बाहर है/ इतिहास से। (पृ. 68) घर-परिवार के लिए हर पल, हर क्षण, जीवन-भर स्वयं को होम करती नारी का जौहर इतिहास नहीं देखता। इतिहास तो उस जौहर को देखता है, जो एक पुरुष के बदले कई स्त्रियों के होम हो जाने की विवशता को सुनहरे अक्षरों में लिखकर गर्व करता है।
ख्याल की बैसाखी और कमलगट्टा उदास है, में पसरी उदासी उन सपनों के बिखर जाने की है, जो जीवन को जीते रहने की विवशता के लिए प्रेरक थे। ऐसे ‘आतंकी सपने’ हर बार टूटकर भी सिर उठाते हैं और उनका आना फिर एक बार टूटने की प्रक्रिया की शुरुआत कर जाता है। बच्चा क्यों रोया..., बच्चे को रोने न दो..., यही होना था, आंसुओं का हिसाब और दांत उगने से पहले आदि कविताएँ बच्चों के जीवन की पड़ताल करती हैं। इन कविताओं में अपने बचपन को जी लेने की आस लिए मौन संघर्षरत बच्चों के मार्मिक चित्र हैं, जो अनेक विचारों को, उद्वेलनों को उपजा देते हैं। रो रही है लड़की और संवेदना के पंख जैसी कविताएँ आज के समाज की क्रूर बर्बरता को उकेरती हैं। अपने आसपास ही असुरक्षा के बोझ से दबी, डरी-सहमी लड़की अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही जीवन-भर ऐसे बोझ को ढोती रहती है। उम्र के हर पड़ाव पर उसके लिए संघर्ष हैं, इन संघर्षों से जूझते-टकराते हुए वह अपने साये से भी डरती है। संवेदना के पंख उस बंतो के दर्द को बयाँ करते हैं, जो निर्भया जैसी परिणति को प्राप्त जरूर हुई, मगर निर्भया की तरह चर्चा में शामिल न हो सकी। कवि कहता है कि बंतो के लिए भी इस संसार में बहुत-कुछ है। कवि बंतो से कहता है-
बंतो! तुम अकेली नहीं/  ख़ौफ़ से भरा है, हर आकाश/  जिसके नीचे चलना/ तुम्हारी मज़बूरी है/ इस पूँजीवादी व्यवस्था में/ जहाँ/  राजनीति, धर्म, रख़ैल है उसकी/ और कभी जनवादी कभी/ लोकतंत्र का मुख़ौटा लिए/ घूमते हैं- बहेलिए। (पृ.135)
आज़ाद है भीख़ू का भीख़ू अपने आज़ाद होने का गर्व, अपने सपनों के देखे जाने की आज़ादी का साथ तब तक ही निभा सकता है, जब तक उसके सपने हकीकत में उतरने नहीं लगते हैं। उसके बाद खेत के किनारे चक्कर लगाते लाला के हरकारों की छलिया शाबासी और बाद में खलिहान में इच्छाओं के साथ ही तुल जाती फसलें ही उसके हिस्से में रह जाती हैं। आज़ाद भीख़ू की आज़ादी तो कब की जा चुकी है, उसकी सोच पर भी बंदिशें लग जाती हैं। उसके हिस्से में केवल भय और आशंका का सैलाब रह जाता है। एक अलग-सी चिंता को कवि ने भीख़ू के जरिए साझा किया। देखिए बानगी-
बिटिया छोटी है/ आधुनिकता की हवा में/ झुलस रहा समाज/ आतंक बन खड़ा है/ ज्यूं कटाई से पहले/ बरसात का कहर।
अभी से करनी होगी तैयारी/ टूट चुके हैं दूध के दांत/ ख़ुद दूधिया होने के सफ़र पर है बेटी/ मंडराने लगे हैं मंत्री के कारिंदे/ और/ मिंजर पड़ते ही/ ख़ेत में चिड़ियों की डार देख/ शुरू हो गई है/ भीख़ू की सोच पर बंदिशें।। (पृ. 128-129)
कवि का कथन है कि उसकी कविता- कविता नहीं सवाल के रूप में जानी जाए-
दोस्तो! मैं कोई/ कविता सुनाने नहीं/ आज पूछने आया हूं/ एक सवाल--/ कैसा लगता है/ जब/ भेड़ समझ जिसे सराहते रहे/ --वर्षों/ और/ एक दिन/ ख़ाल बदलते वक्त/ तुम्हें उसमें छिपा/ --भेड़िया दिख जाए। (पृ. 96)
यह साहित्य की ताकत होती है कि वह नीर-क्षीर विवेक के माध्यम से उस कटु यथार्थ की साझेदारी करता है, जिसका शब्दबद्ध होना समय और समाज के प्रति दायित्वों के निर्वहन हेतु अनिवार्य होता है। जब संक्रमण का काल होता है, तब साहित्य ही समाज को दिशा दिखाने के अपने दायित्व का निर्वहन करने हेतु अग्रसर होता है। कवि को कविता नहीं सवाल की जरूरत ही इसलिए पड़ी है, क्योंकि आज का समय उन विषमताओं से पूर्ण है, जिनके बीच कविता मन का रंजन करके नहीं रह सकती। यह तब भी संभव नहीं है, जब कलम किसी ऐसे सत्यान्वेषी, जागरूक, समर्पित, निष्पक्ष और जमीन से जुड़े कलमकार के हाथ में हो; समय की विसंगतियाँ, समाज की विद्रूपताएँ, जीवन के कटु यथार्थ और इन सबसे संघर्ष की आसन्न स्थितियाँ जिसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, माथे पर चिंता की लकीरें खींच देती हों। साहित्य के साधक इस भूमिका से स्वयं को अलग नहीं कर सकते। डॉ. शुभदर्शन कविता नहीं सवाल के जरिए ऐसे ही सवाल उठाते हैं। कविता क्या होती है? इस प्रश्न के दो उत्तर दृष्टव्य हैं-
कविता तो वह होती/ जो/ गोबर सने हाथों से/ कर रही शर्म ढांपने का/ विफल प्रयास/ फटी कमीज में गढ़ती/ अपने पति से कर्ज़ वसूलने आए/ साहूकार की पैनी नज़र/ और/ एक ही सांस में/  निगल जाने को/ लपलपाती जीभ को भांप/ लाला की बेशर्म आंख/ और/ उसकी दलाली को उठे/ हाथों को/ सम्मानित करने की/ दास्तां होती। (पृ. 99)
कविता तो बेशर्मी और/ मर चुकी संवेदना की/ वह कहानी होती है/ जो/ डिग्री के नाम पर/ नकल की राह दिखा/ तैयार करती/ बौने, अधूरे/ साहित्यकारों की फौज/ जो करते अनुशंसा/ अपने आका को/ देने की राष्ट्रीय पुरस्कार/ या/ फिर अपने-अपने/ ख़ेमों में घिरे/ मठाधीशों को बनाने/ महान् विद्वान/ चकला घरों की तरह/ बनी संस्थाओं से/ मिले अवार्ड को/ दलालों की माफ़िक/ प्रचार करती/ अखबारों की प्रशंसा में/ झुकाती सर। (पृ. 100-101)
समकालीन परिदृश्य में कविता की पड़ताल करते ये उत्तर वास्तव में साहित्य के वर्तमान में गहरे तक उतरकर उस संकट को देखने की कोशिश करते हैं, जिसके कारण साहित्य का अपनी भूमिका से भटकाव प्रत्याशित है। इतने तीखेपन के साथ बात कहने का माद्दा भी उसी में हो सकता है, जो गहरे पानी पैठा हो। इतने साहस के साथ वही सवाल कर सकता है, जो ज्यों की त्यों कमरिया धर देने की सामर्थ्य रखता हो। साहित्यकार की खाल ओढ़कर प्रपंच रचने वालों से, अपनी स्वार्थपूर्ति को केंद्र में रखकर कागज में शब्द उकेरने वालों से संघर्ष की जो स्थिति है, उसे भी कवि ने बखूबी उकेरा है।
और अंत में संघर्ष तो करना होगा, इस जीवट के साथ संग्रह अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। जिस संघर्ष का छोर नहीं है, उसकी अनेक स्थितियों को खंगालते हुए जब कवि कहता है कि-
चिल्ला रहे थे लोग/ फैलते जा रहे थे उसके डैने/ मानवीकरण हो गया था/ बदल गई थी मानसिकता/ सभी ओर बढ़ रहे थे- काले साये/ कला, साहित्य, समाज, धर्म,/ राजनीति, हर रिश्ते की गरिमा/ बचाने की ख़ातिर/ संघर्ष तो करना होगा/ करनी होगी बग़ावत/ मुट्ठी भर आकाश से/ उकाबी पट्ठों की मार पर/ विभिन्न वादों के जाल में/ जकड़ के अपने/ सियासती षड्यंत्रों में लीन/ झंडाबरदारों के स्वार्थी पंखों से/ बढ़ रहे अंधेरे के खिलाफ। (पृ. 139-140)
  संघर्ष के लिए कटिबद्ध कवि की आत्मविश्वास से भरी पंक्तियाँ पाठक को भरोसा दिलाती हैं कि साहित्य का सारा आकाश भले ही उकाबों से भर गया हो; चापलूसों, पुरस्कारों, राजनीतिक आकाओं के कीचड़ को घनी आबादी वाले किनारे एकत्रित कर रखा हो, मगर अधिकांश जल इस कारण स्वतः ही साफ हो गया है। साहित्य की इस स्वच्छता को, इसकी निर्मलता और पवित्रता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना होगा। साहित्य अपने दायित्व को निभाता रहे, इसके लिए भी संघर्ष का छोर नहीं है। इस संघर्ष की नियति रुकने की नहीं, निरंतर गतिमान रहने की है। प्रतीकों, बिंबों और शब्दों के सटीक प्रयोगों ने समीक्ष्य कृति की लगभग सभी कविताओं में ऐसा पैनापन ला दिया है कि पाठक उनमें निहित वैचारिक गांभीर्य में स्वतः उतर जाता है। कविताओं को पढ़ते हुए जीवन की गति चलती जाती है। कवि के लिए जिस संघर्ष का अंत नहीं होता, वह संघर्ष पाठक का अपना भी हो जाता है। यही समीक्ष्य कृति की विशिष्टता है, जो इसे संग्रहणीय बनाती है।
समीक्ष्य कृति- संघर्ष का छोर नहीं, शुभदर्शन, सभ्या प्रकाशन, मायापुरी इंडस्ट्रियल एरिया, फेस-I, नई दिल्ली-64, सितंबर, 2015, मूल्य- रु. 250/-  
डॉ. राहुल मिश्र
(नूतनवाग्धारा, बाँदा, संयुक्तांक 24-25, वर्ष- 9, मार्च, 2016 में प्रकाशित)

Sunday, 10 April 2016


तुलसीदास के उपास्य का वैशिष्ट्य और विन्यास
राम  नाम  मनि  दीप धरु  जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरहुँ जो चाहत उजिआर ।।1
गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि अगर अंतरिक और बाह्य जगत् में उजाला चाहते हो तो अपनी जीभ रूपी देहरी के द्वार पर राम नाम रूपी मणि को रखो। राम के नाम और उनके गुणों के प्रभाव को आत्मसात करके मन के अंदर की उमंग को पाया जा सकता है और बाहर भी जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है। तुलसी के राम इन विशिष्टताओं के प्रतीक हैं। अपने उपास्य के माध्यम से अपनी समन्वयात्मक दृष्टि को भक्ति-भावना के साथ जोड़कर लोकमंगल की साधना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास की स्थिति लोकनायक से कम नहीं आँकी जा सकती है, क्योंकि उन्होंने अत्यंत विषम सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के बीच अपने उपास्य की लोककल्याणकारी छवि का सृजन किया है। तुलसीदास को रामभक्त कवि के रूप में जाना जाता है। तुलसीदास की कीर्ति का अक्षय स्रोत श्रीरामचरितमानस है। बाबा तुलसी ने राम के चरित-गान के माध्यम से, श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जिस व्यापक विश्वधर्म की स्थापना की, जिस वैश्विक स्वीकार्यता की स्थापना की, उसने भारतीय ही नहीं, विदेशी विद्वानों को भी अभिभूत किया है। रूस के प्रसिद्ध विद्वान वरान्निकोव ने श्रीरामचरितमानस का रूसी भाषा में पद्यबद्ध अनुवाद किया। रेवरेण्ड एटकिन्स ने अंग्रेजी में मानस का अनुवाद किया। ऐसे ही तमाम अध्ययन-अनुसंधान कार्य तुलसीदास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विदेशों में हुए हैं या विदेशी विद्वानों द्वारा हुए हैं। ये तथ्य, ये कथन उस विश्वधर्म की व्यापकता और वैश्विक स्वीकार्यता को इंगित करते हैं। भारतवर्ष के धुर देहातों में बहुत से ऐसे लोगों को तुलसी का मानस कंठस्थ है, जिन्हें अक्षरज्ञान भी नहीं है, जो लिख-पढ़ भी नहीं सकते हैं।
तुलसी के उपास्य राम युगों-युगों से जिज्ञासा के केंद्र में रहे हैं। वाल्मीकि रामायण में आदिकवि वाल्मीकि की जिज्ञासा रामकथा के प्रणयन का माध्यम बनती है। अब्दुल हलीम ‘शरर’ लिखते हैं कि- पुराने चंद्रवंशी परिवार विशेषकर राजा रामचंद्र जी के महान और बेमिसाल कारनामे इतने अधिक हैं कि इतिहास उन्हें अपने अंदर समोने में असमर्थ है और यही कारण है कि उन्होंने इतिहास की सीमाएँ लाँघ कर धार्मिक पवित्रता का रूप धारण कर लिया है। आज हिंदुस्तान का शायद ही कोई ऐसा अभागा गाँव होगा जहाँ उनकी याद हर साल रामलीला के धार्मिक नाटक के माध्यम से ताज़ा न कर ली जाती हो।2 तुलसीदास के आराध्य राम के जीवन-चरित के मंचन की परंपरा की शुरुआत तुलसीदास ने की थी, मगर रामकथा के प्रणयन का प्रारंभ वाल्मीकि के समय में ही हो गया था। वाल्मीकि ने राम के जीवन-चरित को अद्भुत काव्य-कौशल के साथ रचा और उनके परवर्ती कवि, भक्तकवि राम के चरित्र का गान करते रहे। आदिकवि वाल्मीकि और उनके परवर्ती कवियों ने राम के विविध स्वरूपों का सृजन किया। राम कभी मानव तो कभी देवत्व के गुण से विभूषित होकर भारतीय संस्कृति के प्राण के रूप में स्थापित होते गए। वाल्मीकि के बाद राम और रामकथा के नए आयाम का सृजन बाबा तुलसी के हाथों हुआ। बाबा तुलसी के राम का विस्तार देश ही नहीं, दुनिया में हुआ। आधुनिक संदर्भ में देखें, तो विदेशों के विद्वानों के साथ ही देश के विविध विद्वानों और लोकनायकों के लिए राम जिज्ञासा के केंद्र में रहे हैं और वर्तमान में भी हैं। महात्मा गांधी रामराज्य की बात कहते हैं, जहाँ तुलसी के राम ही गांधी के रामराज्य के केंद्र में हैं। इस तरह राम के जीवन-चरित का वर्तमान संदर्भ से संबंध रामकथा के उपरोक्त दोनों कालखंडों की स्थिति के साथ जुड़ जाता है और रामकथा के तीन युगों को देखा जा सकता है। वाल्मीकि युग, तुलसी युग और तुलसी का परवर्ती कालखंड या आधुनिक परिदृश्य। 
वाल्मीकि के राम और तुलसी के राम के मध्य विभेद सामयिक अनिवार्यताओं और संक्रमण की स्थितियों के कारण है। बाबा तुलसी का युग ऐसे लोकनायक की प्रतीक्षा में था, जो विषमताओं से जूझ रहे समाज को दिशा दे सके, नीति और मर्यादा का पाठ पढ़ाकर जीवन की दशा और दिशा को कल्याणकारी बना सके। महान् मुगल सम्राट अकबर जब आगरे में बैठकर भारत की छिन्न-भिन्न राजनीति के सूत जोड़ रहे थे, और ढहे हुए साम्राज्य की फिर से नींव रख रहे थे, तब हिंदुओं की धर्मपुरी काशी में वह तुलसीदास साधु एक कुटिया में गंगातीर पर बैठकर छिन्न-भिन्न और अस्त-व्यस्त हिंदू-धर्म को संगठित करने के लिए रामसूत्र रच रहा था। जिसमें गहन चरित्र, असाधारण धैर्य और असह्य तेज था। उसका यह रामसूत्र करोड़ों मुमूर्ष हिंदू जनों के लिए जीवन-पथ का दिव्य आलोक प्रमाणित हुआ।3 बाबा तुलसी ने यह कार्य वाल्मीकि के राम की पुनर्सर्जना करके किया। श्रीरामचरितमानस ग्रंथ इसी कारण तुलसी की असाधारण सर्जना के केंद्र में स्थापित होता है। ‘मानस’ की रचना में कवि ने संस्कृत, प्राकृत आदि के विभिन्न पौराणिक एवं साहित्यिक ग्रंथों का उपयोग सम्यक् रूप में किया है। कथा का मूल आधार वाल्मीकीय रामायण है, किंतु उसमें अनेक स्थानों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन भी पर्याप्त मात्रा में किया गया है, जिसमें कवि की मौलिक दृष्टि का उन्मेष मिलता है।4 तुलसीदास की मौलिक दृष्टि उनकी धार्मिक भावनाओं की प्रबलता के पोषण के साथ ही काव्यात्मकता के प्रति सचेत दृष्टि और काव्य-कला की सौंदर्यात्मक उत्कृष्टता के साथ लोक के प्रति कल्याण के भाव से, हित के भाव से संपृक्त है। बाबा तुलसी की यह मौलिक दृष्टि मानस में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इसी कारण भूगोल के बंधनों से, काल के बंधनों से मुक्त बाबा तुलसी का ‘मानस’ एक ग्रंथ मात्र नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के बौद्धिक, कलात्मक और भावुक ग्रंथों का समन्वित रूप है। यह जीवनोपयोगी भी है, गंभीर भी है और बौद्धिक-दार्शनिक तत्त्वों से युक्त भी है। राम की गूढ़ कथा एक ओर निर्गुण, निराकार परमात्मा को हमारे अपने समाज का व्यक्ति बना देती है तो दूसरी ओर परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर सत्य और प्रेम की रक्षा की, मर्यादा के पालन की ऐसी सीख दे जाती है, जो अनपढ़ के लिए भी सहज और सुग्राह्य हो जाती है। तत्कालीन समाज में धर्मों और पंथों को लेकर खिंची विभेद की दीवारों को तोडने का पहला प्रयास बाबा तुलसी करते हैं। वे मानस में लिखते हैं-
बंदऊँ  राम  नाम रघुबर को । हेतु  कृसानु   भानु हिमकर को ।।
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।5
तुलसीदास अपने उपास्य राम की वंदना करते हुए कहते हैं कि अग्नि (र बीज मंत्र रूप), सूर्य (आ बीज मंत्र रूप) तथा चंद्र (म बीज मंत्र रूप) के बीज मंत्र रूप में ‘राम’ का नाम है। ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का स्वरूप है। ‘राम’ नाम निर्गुण होकर भी अनुपम गुणों का भंडार है। इस प्रकार तुलसी के राम समन्वय के अद्भुत स्वरूप हैं, जिनमें सगुण और निर्गुण को देखा जा सकता है, जिनमें विविध संप्रदायों के समन्वय को भी देखा जा सकता है। ‘राम’ का नाम अनुपम गुणों का भंडार इस कारण भी है, क्योंकि उनमें भगवत्ता और मानवता का अनुपम संयोग भी होता है। तुलसीदास लिखते हैं कि-
जगु पेखन तुम्ह  देखनिहारे । बिधि  हरि  संभु   नचावनिहारे ।।
तेऊ न जानहिं मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहिं को जाननिहारा ।।6   
जब वनवासी राम वाल्मीकि के आश्रम में जाकर उनसे अपने रहने के लिए स्थान के बारे में पूछते हैं, तब राम के प्रश्न के उत्तर के रूप में वाल्मीकि के मुख से तुलसीदास राम को ब्रह्मा, विष्णु और महेश को नचानेवाला कहकर राम को देवत्व से ऊपर प्रतिष्ठापित करवाते हैं। आधुनिक संदर्भ में इसे राम के मानवीय स्वरूप की स्थापना के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ मानव अपने गुणों के माध्यम से देवत्व की स्थिति से ऊपर पहुँच जाता है। वाल्मीकि कहते हैं कि देवगण भी राम के रहस्य को नहीं जानते हैं। वाल्मीकि का यह कथन राम में विकसित उदात्त मानवीय गुणों को व्याख्यायित करता है, जिनके माध्यम से राम देवों से ऊपर हैं। तुलसीदास द्वारा मानस में स्थापित देवत्व के ऊपर मानवता का स्थान, तुलसी की यह स्थापना सामयिक अनिवार्यता भी थी, जिसके माध्यम से तुलसी ने समाज को नीति और मर्यादा की सीख देने का प्रयास किया।
तुलसी के उपास्य राम में शक्ति, शील और सौंदर्य का संयोग देखने को मिलता है। चरित्र की दृष्टि से वे सर्वश्रेष्ठ मानव और मर्यादापुरुषोत्तम बन जाते हैं। राम की विनयशीलता और उनकी करुणा उनके शील को आलोकित करती है। उनकी शक्ति कभी भी उन्हें अपने पथ से विचलित नहीं करती, बल्कि उदात्त मानवीय गुणों के विकास में सहायक बनती है। उनकी दयालुता, शरणागतवत्सलता, उदारता, सौहार्दभाव और परदुःखकातरता का परिचय तुलसीदास के माध्यम से अनेक स्थानों में प्राप्त होता है। सभी को साथ लेकर चलने का भाव राम की विशेषता है, इसी कारण कोल, भील, निषाद और वानर आदि विविध आदिवासी जाति-समूह बिना किसी भेद के राम के सहयोगी बन जाते हैं। शबरी और अहल्या के उद्धार के प्रसंगों के माध्यम से तुलसीदास ने अपने उपास्य के सर्वसमावेशी स्वरूप को प्रकट किया है। इसके अतिरिक्त मानस में अनेक प्रसंगों के माध्यम से तुलसीदास ने अपने उपास्य के उदात्त मानवीय गुणों को प्रकाशित करने का प्रयास किया है।
राम और रावण के व्यक्तित्वों का विशद विवेचन तुलसी ने किया है और इसके माध्यम से उन्होंने मानवीय गुणों की स्थापना की है। राम और रावण मानवता और दानवता के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि राम में इन वृत्तियों के उदात्त रूप के दर्शन होते हैं तथा रावण में यही वृत्तियाँ निकृष्ट रूप में व्यक्त हुईं हैं। काम एक रागात्मक वृत्ति है, किंतु वह उत्कृष्ट रूप को पाकर वैभव से निर्लिप्त हो जाता है तथा निःस्वार्थ मैत्रीभाव तथा लोकोपकार ही उसका लक्ष्य हो जाता है। राम उत्कृष्ट काम से अभिप्रेरित थे, इसीलिए उन्होंने रावण और बालि के राजकीय वैभव का परित्याग कर विभीषण तथा सुग्रीव का परित्राण किया। शूर्पणखा जैसी मायावी नारी के लावण्य-जाल में उनका मन नहीं उलझा। वे धर्म संस्थापन तथा सज्जन-संरक्षण के कार्य में ही रत रहे।7 दूसरी ओर रावण की दानवता उसके अहम् के कारण है, जिसमें वह आत्मकेंद्रित होकर वैयक्तिक स्वार्थ की साधना करता रहा, अपने विरोधियों को परास्त करने के प्रयासों में ही संलग्न रहा। इसके लिए उसने निर्दोषों की नृशंस हत्या भी की, अनीति को प्रोत्साहन भी दिया और अत्याचार-अन्याय की पराकाष्ठा को प्राप्त भी किया। तुलसी के रावण व्यक्तित्व वाले दैत्य रामभक्त एवं वीर योद्धा हैं। राम के द्वारा मारा जाना ही रावण का आध्यात्मिक लक्ष्य तथा अपने तमोगुण युक्त शरीर से मोक्ष प्राप्त करने का उपाय था। इसके लिए उनको इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं दिखाई दिया था। आत्मीय जनों का उपदेश सुनने पर भी सीता को न छोड़ने का कारण उनकी रामभक्ति मात्र थी।8 मानस के विवेचन में विद्वान भले ही तुलसी की रामभक्त लेखनी की उपज के रूप में इस प्रकार रावण को रामभक्त दिखाने का प्रयास मानते हों, किंतु आधुनिकताबोध इस तथ्य का विश्लेषण दूसरे अर्थों में करता है। इसके लिए विनयपत्रिका में रावण और उसके साम्राज्य के संबंध में तुलसी के मत को देखना होगा। वे विनयपत्रिका के 58वें पद में लिखते हैं कि- मन रूपी मय दावन द्वारा रचित सुप्रवृत्तियों के समान लंकादुर्ग का निर्माण किया गया है। इसमें महामोह रूपी रावण, अहंकार रूपी कुंभकर्ण और अशांति उत्पन्न करने वाले काम रूपी मेघनाद का निवास हो गया है। यहाँ पर लोभ रूपी अतिकार्य, मत्सर रूपी महोदर, क्रोध रूपी देवांतक, द्वेष रूपी दुर्मुख, दंभ रूपी खर, कपट रूपी अकम्पन, दर्प रूपी मनुजाद और मद रूपी शूलपाणि राक्षस निवास करते हैं। इस लंका दुर्ग में राम के गुणों का पालनकर्ता, राम के चरणों का सेवक जीव रूपी विभीषण दुष्टों के वन के मध्य चिंताग्रस्त होकर निवास करता है।तुलसीदास के हृदयकमल में निवास करने वाले राम अपने सत्कर्म रूपी सेतु का निर्माण करके दानवी प्रवृत्तियों का विनाश करके सारे संसार का कल्याण करते हैं।9 इस प्रकार रावण मन के भावों का परिचायक है। किसी व्यक्ति में सत् और असत् वृत्तियों की समान रूप से उपस्थिति होती है, मगर उनमें जिस वृत्ति का पलड़ा भारी होता है, मानवीय कार्य-व्यवहार भी उसी के अनुरूप होते हैं। इतना अवश्य है कि सत् वृत्तियों के प्रति अंतरात्मा का आकर्षण होता है और उन्हें प्राप्त करने की चेष्टा भी निरंतर चलती रहती है। राम सत् वृत्तियों के प्रतीक हैं, इस कारण रावण की राम के प्रति भक्ति सहज प्रतीत होती है। नरेंद्र कोहली ने आधुनिकताबोध से संपृक्त रामकथा (अभ्युदय) में इस तथ्य को प्रतिरावण के माध्यम से स्पष्ट किया है।
तुलसीदास के उपास्य राम का विशिष्ट गुण है- मर्यादा। तुलसी राम का चरित्र चुनते हैं अपने लिए जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और हर तरह से आदर्श के प्रतिरूप हैं: आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र, आदर्श भ्राता, सबसे अधिक आदर्श पति, और फिर आदर्श शासक।10 तुलसी के राम अपने जीवन में, अनेक प्रसंगों में मर्यादा का निर्वहन करते हैं। मानस में विविध प्रसंग राम की मर्यादा को व्याख्यायित करते हैं। सीता स्वयंवर के प्रसंग में तुलसीदास लिखते हैं कि-
रघुबंसिन्ह  कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु  धरै  न काऊ ।।
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ।।11
राम के मन में अमिट विश्वास है कि रघुकुल की परंपरा को वे समग्र दृढ़ता के साथ निभा रहे हैं। वे कभी गलत रास्ते पर नहीं चले हैं और न ही सपने में भी कभी दूसरे की पत्नी पर कुदृष्टि डाली है। पारिवारिक जीवन की मर्यादा के सम्यक् निर्वहन को राम में देखा जा सकता है। राजा दशरथ द्वारा राम को वनवास दिये जाने पर व्यथित सीता को राम अपने साथ नहीं ले जाना चाहते हैं। वे कहते हैं कि-
हंसगमनि  तुम  नहिं बन  जोगू । सुनि  अपजस  देहहिं मोहि लोगू ।।12
इसके उत्तर में सीता कहती हैं कि-
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू ।।13
मैं सुकुमार हूँ, इसलिए मैं वन को नहीं जा सकती, मगर मैं महलों में रहकर सुखों का भोग करूँ और आप वन में तापस-जीवन व्यतीत करें, यह भी तो उचित नहीं है, इसलिए मैं आपके साथ वन को चलूँगी। पारिवारिक जीवन में इस प्रकार का समर्पण और नेह-प्रेम पुरातन भारतीय परंपरा की आदर्श स्थिति को प्रकट करता है। राम और सीता के मध्य का यह संवाद पवित्र सामाजिक आदर्श की स्थापना भी करता है।
पारिवारिक जीवन के साथ ही आदर्श भ्राता, आदर्श शिष्य, आदर्श पुत्र और आदर्श शासक के रूप में राम की विशिष्टताएँ प्रेरणापरक बन जाती हैं। तुलसीदास ने अपने भक्त-भाव के विकास के साथ ही अपने सामाजिक दायित्व के बोध का निर्वहन भी किया। उन्होंने तत्कालीन समाज के विघटन की भयावह स्थितियों को न केवल देखा था, वरन् गहराई के साथ उसके दुष्प्रभावों को अनुभूत भी किया था। इसी कारण तुलसीदास ने व्यक्तिगत-पारिवारिक जीवन की विसंगतियों को, धार्मिक मर्यादाओं की उपेक्षा की विषम स्थितियों को और राजनीतिक विकृतियों को समाधान देने का प्रयास किया। इस तरह तुलसी के उपास्य राम उनकी भक्ति-भावना की पुष्टि के साथ ही उनके सामाजिक दायित्व-बोध के निर्वहन का माध्यम भी बन जाते हैं। तुलसी अपने उपास्य के माध्यम से समाज को मर्यादित जीवन जीने की सीख देते हैं, तमाम समस्याओं के समाधान भी देते हैं। तुलसीदास को रामभक्त कवि और अनन्य रामभक्त कहकर अनेक विद्वान उनका मूल्यांकन करते हैं, किंतु उनकी रामभक्त लेखनी धार्मिक संकीर्णताओं में बँधी हुई नहीं थी, वरन् तत्कालीन स्थितियों के अनुरूप तुलसी ने भक्ति-भाव की धारा के प्रवाह के माध्यम सामान्य-जन तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयास किया था। उनकी बात सामान्य-जन तक सरलता के साथ पहुँच सके, इसलिए उन्होंने ‘मानस’ का प्रणयन भी आम-जन की बोली-बानी में किया। जो लोग उस पर भी न समझ सकें, उनके लिए रामलीला के मंचन का प्रारंभ उन्होंने किया। फलतः संपूर्ण मध्यभारत में रामलीलाओं के माध्यम से तुलसी के उपास्य की विशिष्टताओं का विस्तार हुआ।
 वाल्मीकि के कालखंड की तुलना में तुलसी का समय अनेक विषमताओं से, चुनौतियों से भरा हुआ था। वाल्मीकि की तुलना में तुलसी के समक्ष बड़ी जिम्मेदारी भी थी, समाज को एक सूत्र में बाँधे रखने की, विघटन से बचाने की, पुरातन नीतियों-मर्यादाओं-आदर्शों को बचाए रखने की। तुलसीदास ने अपनी जिम्मेदारी का सम्यक्, सर्वांग निर्वहन किया, जिसके लिए युगों-युगों से जिज्ञासा के केंद्र में रहे राम का व्यक्तित्व और कृतित्व माध्यम बना। तुलसीदास तत्कालीन परिस्थितियों की विभीषक स्थितियों को अनुभूत करते हुए उसे कलियुग का नाम देते हैं और कहते हैं कि राम का नाम ही कलियुग के लिए कल्पतरु है और कलियुग में कल्याण करने वाला है। राम नाम का स्मरण करके ही भाँग-सा निकृष्ट पौधा भी तुलसी के पौधे की तरह उत्कृष्ट हो गया है-
नाम राम को कलप तरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ।।14
तुलसी के परवर्ती कालखंड में, वर्तमान में भी चुनौतियाँ कम नहीं हुईं, फलतः राम का नाम सहारा बना और तुलसी के उपास्य ने एक बार फिर से समाज में मानवीय गुणों को पुष्पित-पल्लवित करने में योगदान दिया। भारत में बर्तानिया हुकूमत के समय अनेक मजदूर बंधक बनाकर बर्तानिया उपनिवेशों में ले जाए गये। अपने देश से दूर उन मजदूरों के लिए तुलसी का ‘मानस’ और तुलसी के उपास्य ही सहारा बने। फीजी, सूरीनाम, मॉरीशस और त्रिनिदाद-टोबैगो सहित दुनिया के तमाम देशों में तुलसी का मानस पहुँचा। इन देशों में आज भी भारतवंशियों के लिए तुलसी के राम, उनका ‘मानस’ और उनकी रामलीला जीवंत-जागृत है।
वर्तमान जीवन-शैली में तुलसी के राम की प्रासंगिकता नए अर्थों के साथ स्थापित हुई है। महात्मा गांधी ने आजाद भारतदेश के लिए रामराज्य का स्वप्न देखा था, जिसमें राजा और प्रजा मर्यादित बनें, परिवारों में मर्यादा की स्थापना हो, ताकि रामराज्य की स्थापना के माध्यम से भारतदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टता पुनः स्थापित हो सके। बापू राम के साथ, या यों कहें कि तुलसीदास के राम के साथ, बहुत दूर तक एकाकार हो गये थे। दक्षिणी अफ्रीका में ही बापू ने अपने चिंतन को एक दिशा दे दी थी और उसका एक नाम भी रखा गया था- सर्वोदय। यह शब्द जैन दर्शन से लिया गया था, तथापि इसके पीछे मूल कल्पना तुलसी की कल्पना के रामराज्य की थी।
बापू ने सर्वोदय दर्शन को पाश्चात्य उपयोगितावादी दर्शन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बेंथम, मिल और लॉक ने लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए उसके सामने लक्ष्य रखा- अधिकतम लोगों का अधिकतम हित। बापू ने कहा कि यह आदर्श सही नहीं है। सही आदर्श यह है कि समाज के सब लोगों का संपूर्ण हित साधने के लिए समाज, राज्य और व्यक्ति को मिलकर कार्य करना चाहिए। इस आदर्श की पुष्टि के लिए उन्होंने पश्चिमी विचारकों और पाश्चात्य जनता को संतुष्ट करने के लिए सुकरात, लियो तॉलस्तॉय, जॉन रस्किन, डेवि थोरों और इमर्सन जैसे विचारकों का चिंतन सर्वोदय के पक्ष में प्रस्तुत किया, परंतु सत्य यह है कि उनके मन की पृष्ठभूमि में तुलसी की कल्पना का रामराज्य घर किये बैठा था। रामराज्य उनके लिए महज दैवी राज्य नहीं था, वरन् वह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक था, जिसमें-
 बयरु  न कर काहू सन  कोई ।  राम प्रताप  विषमता खोई ।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ।।
राम भगति नर अरु नारी । सकल परमगति के अधिकारी ।।15  
गांधी जी का स्वप्न भले ही साकार न हो पाया हो, मगर आदर्श भारत के लिए इसकी अपेक्षा वर्तमान में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। नया संकट पाश्चात्य प्रभावों से आज नए रूप में देखा जा सकता है। पाश्चात्य जीवन-शैली के ‘माइक्रो-फैमिली कल्चर’ और टूटती-बिखरती ‘फैमिली वैल्यूज़’ के घातक दुष्परिणामों से बचने के लिए श्रीरामचरितमानस के रूप में हमारे पास ऐसा अमोघ अस्त्र है, जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान जीवन में उत्तरोत्तर बढ़ रही है। रामकथा को आधार बनाकर अनेक भक्त कवियों ने उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं, किंतु रामकथा को लोक-व्यवहार से, लोक-जीवन की मान्यताओं-मर्यादाओं और समाज की मानवीय अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने का काम बाबा तुलसी ने ही किया है। बाबा तुलसी ने मानस के माध्यम से, अपने उपास्य राम के माध्यम से समूचे परिवार के मर्यादित आचरण को समग्रता के साथ प्रस्तुत किया है। परिवार के व्यापक अर्थों में समाज और राष्ट्र के लिए राम की प्रासंगिकता को अनुभूत किया जा सकता है। तुलसी के उपास्य राम का चरित्र, उनके गुण, उनका व्यक्तित्व अपरिमित है, अतुलनीय है और उनके व्यक्तित्व का, उनके चरित्र का एक अंश ही अनेक विषमताओं के निराकरण की सामर्थ्य रखता है।
जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ।।16
संदर्भ-
1.  1.     गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 1/ 21, पृ. 78
2.     पुराना लखनऊ (गुज़िश्ता लखनऊ), अब्दुल हलीम शरर, अनुवाद- नूर नबी अब्बासी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली-70, प्रथम सं. 1971, पृ. 01
3.     धर्मध्वज तुलसीदास, हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास, आचार्य चतुरसेन, गौतम बुक डिपो, देहली, प्रथम सं. 1949, पृ. 251
4.     पौराणिक प्रबन्ध-काव्य-परम्परा (तथाकथित राम-भक्ति शाखा), हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, गणपति चन्द्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, नवम् सं. 2010, पृ. 222
5.     गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 1/ 1-2/19, पृ. 76-77
6.     वही, 2/1-2/127, पृ. 444
7.     कथानक पर आधृत मानवतावाद, तुलसी का मानवतावादी दृष्टिकोण, डॉ. रामाप्रसाद मिश्र, नीरज बुक सेंटर, दिल्ली-92, प्रथम सं. 2005, पृ. 46
8.     हिंदी का भक्ति-साहित्य, भक्ति-आंदोलन और साहित्य, डॉ. एम. जॉर्ज, प्रगति प्रकाशन, आगरा, प्रथम सं. 1978, पृ. 369-370
9.    गोस्वामी तुलसीदास कृत विनयपत्रिका (सटीक), योगेंद्र प्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1998, पद सं. 58, पृ. 96-98
10. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2002, पृ. 49
11.  गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 1/5-6/231, पृ. 241
12.   वही, 2/5/63, पृ. 396
13.   वही, 2/8/67, पृ. 399
14.   वही, 1/26, पृ. 82
15.   बापू के राम, नेमिशरण मित्तल, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली-01, वर्ष- 39, अंक- 17, 05 फरवरी-1989, पृ. 27 
डॉ. राहुल मिश्र
(डॉ. अशोक मर्डे द्वारा संपादित पुस्तक- लोकनायक तुलसीदास : विविध आयाम, प्रकाशक- शिल्पा प्रकाशन, शिव-कांची, बिदर रोड, उदगीर- 413 517, महाराष्ट्र में प्रकाशित)

Tuesday, 23 February 2016


रेडियो वार्त्ता, आकाशवाणी, लेह
विज्ञान और विकास
मानव सभ्यता के विकास के साथ विज्ञान का गहरा संबंध है। आज विकास के जिन आयामों को हम अपने आसपास देखते हैं, वे सभी विज्ञान के माध्यम से ही संभव हो सके हैं। अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों में हमने चंद्रमा ही नहीं, मंगल ग्रह तक उपस्थिति दर्ज कराई है। नगरों और महानगरों में ऊँची-ऊँची बहुमंजिला इमारतों में, सूचना और संचार क्रांति से समृद्ध नगरों और गाँवों में, उन्नत तकनीक से संपन्न उद्यमों और कृषिकार्यों में नए प्रयोगों को, विज्ञान के प्रभाव को देखा जा सकता है। विकास के ये सारे मानक विज्ञान के माध्यम से ही संभव हो सके हैं। दुनिया-भर में हो रहीं नित नवीन खोजों ने, नए-नए अनुसंधानों ने भौतिक विकास को इतनी गति प्रदान की है कि आज मानव जीवन अनेक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण हो गया है। विज्ञान की भूमिका को भौतिक विकास के संदर्भ में अपने आसपास होते बदलावों के माध्यम से समझा जा सकता है।

विज्ञान और विकास के संबंध का एक अन्य पक्ष मानव के जिज्ञासु स्वभाव से भी जुड़ा हुआ है। भदंत आनंद कौसल्यायन अपने निबंध संस्कृति में लिखते हैं कि आसमान में चमकते तारों और ग्रह-नक्षत्रों को जानने की जिज्ञासा, मानव-जीवन को संस्कारों व गुणों से सुसंस्कृत करने वाले ज्ञान के प्रति जिज्ञासा ने विकास के उस पक्ष को समृद्ध किया है, जिसकी जरूरत हमेशा ही मानवता के लिए रही है। इस प्रकार विज्ञान की अनिवार्यता केवल भौतिक विकास के लिए ही नहीं रही है, बल्कि आध्यात्मिक और सहज मानवीय गुणों के विकास के लिए भी रही है। इस प्रकार विज्ञान को मानव सभ्यता के विकास की कहानी से जोड़कर भी देखा जा सकता है। आदिमानव या वनमानुष पेड़ों में रहा करता था। जब उसने धरती पर उतरकर मानव का रूप लिया, तब उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वह अन्य जीवधारियों की तरह बलशाली नहीं था। उसके पास अन्य जीवधारियों की तरह शिकार करके अपना जीवन चलाने की शक्ति भी नहीं थी। वह शेर की तरह वन का राजा नहीं था। वह हाथी की तरह बलशाली, हिरन की तरह फुर्तीला या पक्षियों की तरह उड़ने में सक्षम भी नहीं था। अन्य जीवधारियों की तुलना में उसके पास जो शक्ति थी, वह थी उसके सोचने-विचारने की ताकत और उसके दो हाथ। मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीवधारी है, जो अपने दो पैरों के बल पर भाग सकता है और अपने दो हाथों से काम कर सकता है। मनुष्य ने अपने सोचने-विचारने की ताकत के बल पर ही न केवल धरती पर एकाधिकार स्थापित किया, वरन् दूसरे ग्रहों तक अपनी पहुँच बनाई। यह विज्ञान का ही चमत्कार है, जिसने आदिमानव को आज के जैसा सभ्य-सुसंस्कृत बनाया।

अगर भारतीय विज्ञान की परंपरा की चर्चा की जाए, तो कहा जा सकता है कि जिस समय यूरोपीय घुमक्कड़ जातियाँ अपनी बस्तियाँ बनाना सीख रही थीं, उस समय भारत में सिंधु घाटी के लोग सुनियोजित ढंग से नगर बनाकर रहने लगे थे। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, चन्हूदड़ो, बनवाली, सुरकोटड़ा आदि स्थानों पर हुई खुदाई से पता लगता है कि इन नगरों के भवन पक्की ईंटों के बने हुए थे। यहाँ से जहाजों द्वारा विदेशी व्यापार होता था। यहाँ के नागरिक आवागमन के लिए बैलगाड़ियों का प्रयोग करना जानते थे। माप-तौल का उन्हें ज्ञान था। वे काँसे के बने औजारों का उपयोग करते थे। सोने-चाँदी के आभूषणों का प्रयोग किया जाना स्पष्ट करता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के विकसित होने तक खनन विद्या की जानकारी भी सुलभ हो चुकी थी। ये लोग सूती और ऊनी वस्त्र बनाना भी भली-भाँति जानते थे। वैदिक काल में भारतीयों को 27 नक्षत्रों का ज्ञान हो चुका था। लगध नामक ऋषि ने ज्योतिष वेदांग में तत्कालीन खगोल विद्या का व्यापक वर्णन किया है। गणित और ज्यामिति के साथ ही वैमानिकी और चिकित्साशास्त्र आदि क्षेत्रों में विज्ञान के व्यापक विस्तार को देखा जा सकता है। आर्यभट, वरःमिहिर, ब्रह्मगुप्त, बोधायन, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, कणाद और सवाई जयसिंह तक प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों की लंबी परंपरा को देखा जा सकता है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उस समय श्रेष्ठता की ऊँचाइयों पर स्थापित किया था। जर्मनी के प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी कॉपरनिकस से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व आर्यभट ने पृथ्वी की गोलाकार आकृति और इसके अपनी धुरी पर घूमने की पुष्टि कर दी थी। आइजक न्यूटन द्वारा खोजे गए गुरुत्वाकर्षण के नियम से हजार वर्ष पहले ही आचार्य ब्रह्मगुप्त ने बता दिया दिया था कि धरती में अपना बल होता है, जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचे रखता है। यूरोपीय विद्वान ब्रुक टेलर (Brook Taylor) ने गणित का जो ज्ञान सोलहवीं शताब्दी में दिया, उसे वरःमिहिर ने अपने ग्रंथ सूर्य सिद्धांत में छठी शताब्दी में ही बता दिया था। यूरोपीय गणितज्ञ लैम्बर्ट ने सन् 1761 में पाई के तर्कहीन (Irrational) होने का सिद्धांत दिया था, जबकि आर्यभट ने लैम्बर्ट से लगभग ग्यारह सौ वर्ष पूर्व ही वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात (पाई) का मान 3.1416 निकालकर सिद्ध कर दिया था कि पाई का यह मान अतुलनीय (Irrational) है। कणाद ऋषि ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में ही सिद्ध कर दिया था कि विश्व का हर पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना है। छठी शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त ने शून्य को प्रयोग में लाने के नियम निर्धारित कर दिए थे। पेल इक्वेशन के नाम से प्रसिद्ध वर्ग समीकरण का हल जॉन पेल से लगभग हजार वर्ष पूर्व आचार्य ब्रह्मगुप्त ने दे दिया था।
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत का गौरवशाली अतीत रहा है। चिकित्सा विज्ञान की यह सुदीर्घ परंपरा अथर्ववेद में विकसित हो गई थी। महर्षि चरक द्वारा लिखी गई चरक संहिता काय चिकित्सा का पहला ग्रंथ है। जीवक कौमारभच्च बालरोग विशेषज्ञ थे। अनेक बौद्ध ग्रंथों में उनके चिकित्सा ज्ञान की प्रशंसा मिलती है। वे भगवान बुद्ध के निजी वैद्य भी थे। सुश्रुत संहिता के रचयिता सुश्रुत को आज सारे संसार में प्लास्टिक सर्जरी का जनक माना जाता है। महर्षि पतंजलि ने योग के माध्यम से शरीर को रोगमुक्त रखने का उपाय बताया था। आज सारा संसार योग की शक्ति को स्वीकार कर रहा है। चिकित्सा विज्ञान के साथ ही वास्तु, स्थापत्य और शिल्प के क्षेत्र में भारत की प्रगति को सारा संसार स्वीकार करता है। कुतुबमीनार के निकट स्थापित महरौली का लौह स्तंभ लगभग 1700 वर्षों से ज्यों-का-त्यों खड़ा है। उसमें जंग का नामोनिशान तक नहीं है। कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में स्थापित लौह स्तंभ भी इसी प्रकार का है।
नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के साथ ही ओदांतपुरी (वर्तमान बिहार), नागार्जुनकोंडा (वर्तमान आंध्रप्रदेश), जगद्दला (वर्तमान पश्चिम बंगाल), वलभी (वर्तमान गुजरात), वाराणसी (वर्तमान उत्तरप्रदेश), कांचीपुरम (वर्तमान तमिलनाडु), मणिखेत (वर्तमान कर्नाटक), शारदापीठ (वर्तमान कश्मीर), पुष्पगिरि (वर्तमान उड़ीसा) और सोमपुरा (वर्तमान बांग्लादेश) आदि पुरातन भारत के ऐसे महान शिक्षाकेंद्र हैं, जिन्होंने विश्व को अपार ज्ञानराशि वितरित की है। ज्ञान-विज्ञान-दर्शन की अनेक शाखाओं का विस्तार इन्हीं शिक्षाकेंद्रों से हुआ। इसी कारण पाश्चात्य मूर्धन्य मनीषी लुई जैकलिएट ने भारत के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा है कि- ऐ प्राचीन वसुंधरे! मनुष्य जाति का पालन करने वाली, पोषणदायिनी तुझे प्रणाम है। श्रद्धा, प्रेम, कला और विज्ञान को जन्म देने वाली भारत भूमि को प्रणाम है।’ (संदर्भ- आर्य संस्कृति का प्रथम विश्वविद्यालय विक्रमशिला’, विक्रमशिला का इतिहास, परशुराम ठाकुर ब्रह्मवादी, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2013, पृ. 71)
भारत के संदर्भ में विज्ञान और विकास को, इनके मध्य संबंधों को अतीत से जुड़े इन तथ्यों के माध्यम से समझा जा सकता है। ये तथ्य भारतीय परंपरा में विज्ञान और विकास के अंतःसंबंधों के प्रतिमान हैं। मध्ययुग की शुरुआत और फिर भारत में व्यापारी के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन तक का अंतराल अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। इस दौर में विज्ञान और विकास का क्रम वैसा स्मरणीय नहीं कहा जा सकता, जैसा अपने अतीत में था। ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के साथ ही भारत ने उस औद्योगीकरण को जाना, जिसे पश्चिमी देश पहले ही अपना चुके थे। पाश्चात्य देशों के विज्ञान को पुरातन भारतीय परंपरा का ही आयातित संस्करण कहा जा सकता है, क्योंकि प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को प्रायः आधार बनाकर यांत्रिकी या मशीनीकरण का विकास पश्चिमी देशों में हुआ था। प्राचीन भारतीय परंपरा ने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यंत तीव्र विकास अवश्य किया था, किंतु यांत्रिक या मशीनी स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की थी। आधुनिक और पुरातन वैज्ञानिक परंपरा के बीच बड़ा अंतर यांत्रिकी या मशीनीकरण के विकास का था। यांत्रिकी के विकास से विज्ञान में अनेक रास्ते खुले। रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं के विस्तार ने एक ओर मानव जीवन को सुखमय बनाया, तो दूसरी ओर विभीषक हथियारों ने, मानवताविरोधी अनुसंधानों ने जीवन को भयग्रस्त भी बना दिया।
स्वाधीन भारत ने आधुनिक विज्ञान को स्वीकार करते हुए अपने विकास के लिए, और वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए संकल्पबद्ध होकर कार्य किया है। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा, डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर, डॉ. सी.वी.रमण, डॉ. एम.एन. साहा, डॉ. जगदीशचंद्र बोस, डॉ. नॉरमन बोरलाग, डॉ. बीरबल साहनी और डॉ. हरगोविंद खुराना से लगाकर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तक भारतीय वैज्ञानिकों की ऐसी समृद्ध परंपरा देखी जा सकती है; जिन्होंने कृषि, चिकित्सा, सूचना-संचार, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों को न केवल समृद्ध किया है, वरन् वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को भी स्थापित किया है। अत्यंत कम लागत में मंगल ग्रह की यात्रा करके भारत ने अपनी मेधा से विश्व को चमत्कृत कर दिया है।
विज्ञान का अर्थ होता है- विशिष्ट ज्ञान। यह विशिष्ट ज्ञान ही विकास को गति देता है और विकास की कामना ही विशिष्ट ज्ञान की खोज के लिए प्रेरित करती है। इस तरह विज्ञान और विकास एक-दूसरे के पूरक होते हैं, अन्योन्याश्रित होते हैं। भारतीय परंपरा में विज्ञान और विकास के साथ नीति, मर्यादा, आस्था और धर्मभीरुता जैसे गुण भी जुड़े रहे हैं। भारतीय संदर्भ में विज्ञान की पुरातन परंपरा जहाँ इन गुणों से जुड़ी रही है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक विज्ञान के साथ भी इन गुणों का समावेश देखने को मिलता है। इसी कारण अतीत से लगाकर वर्तमान तक भारतीय परंपरा उस विकास को सदा से नकारती रही है, जो मानवता के लिए, सृष्टि के लिए और धर्म-आस्था के लिए घातक हो। शुद्ध भौतिकता को बढ़ावा देने के प्रश्न पर ही धर्म और विज्ञान में विरोध की बात उठती है। एक ओर भौतिक विकास भी आवश्यक है, तो दूसरी ओर आध्यात्मिक विकास भी अनिवार्य है। पाश्चात्य परंपरा में विज्ञान और विकास के संबंधों की घनिष्ठता के बीच आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य दूर ही रह जाते हैं और इसी कारण वहाँ के समाजों में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ पैदा होने लगती हैं। आज की जीवनशैली में भारत देश भी अनेक विसंगतियों, सामाजिक समस्याओं और विकृतियों से अगर जूझ रहा है, तो उसके पीछे पाश्चात्य प्रभाव ही है।
हिंदी के जाने-माने साहित्यकार धर्मवीर भारती ने अपने नाटक अंधायुग में व्यास के मुख से ब्रह्मास्त्र के भयानक खतरों का वर्णन कराया है। अंधायुग में व्यास जी कहते हैं कि-
लेकिन नराधम / ये दोनों ब्रह्मास्त्र अभी / नभ में टकरायेंगे / सूरज बुझ जाएगा। / धरा बंजर हो जाएगी।।
इन पंक्तियों में ब्रह्मास्त्र के खतरों का जो संकेत दिया गया है, उसमें आधुनिक युग के विज्ञानबोध को देखा जा सकता है। इन पंक्तियों में खतरा परमाणु हथियारों का है। परमाणु हथियारों का ध्वंसात्मक प्रयोग आज की पीढ़ी के लिए बड़ा खतरा है और धर्मवीर भारती की इन पंक्तियों में इस खतरे को देखा जा सकता है। विज्ञान के माध्यम से ऐसा अंधा विकास भारतीय परंपरा का नहीं है। इसी कारण विज्ञान और विकास के साथ धर्म को जोड़ने की बातें की जाने लगीं हैं। विकास की गति को रोका नहीं जा सकता और विकास के लिए विज्ञान अनिवार्य है। अगर विज्ञान को नैतिकता, मानवता और आध्यात्मिकता के बंधन में नहीं रखा जाएगा, तो उसके परिणाम व्यक्ति से लगाकर समाज और राष्ट्र तक के लिए घातक होंगे। आज 26/11 की विभीषक घटना से लगाकर एक व्यक्ति के मन में पनपती हताशा, कुंठा, हिंसा, आक्रोश और क्रूरता की भावनाएँ विज्ञान और विकास के बीच धर्म के तत्त्व के लुप्त हो जाने के कारण उत्पन्न हो रही हैं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया में जिस तरह गाँव-कस्बे से लगाकर नगरों-महानगरों तक, देश के कोने-कोने से विदेशों तक अपसंस्कृति का विस्तार होता जा रहा है, उसके पीछे आधुनिक विज्ञान से संचालित विकास की अनियंत्रित गति के दुष्परिणाम ही हैं। कोरे भौतिकतावाद पर आधारित विज्ञान और उससे होते विकास के दुष्परिणामों को नियंत्रित करने की सामर्थ्य आध्यात्मिकता में ही है। परमपावन चौदहवें दलाई लामा की प्रेरणा से स्थापित माइंड एंड लाइफ इंस्टीट्यूट और साइंस, रिलीजन एंड डेवलपमेंट जैसी परियोजनाएँ इस दिशा में कार्य कर रहीं हैं। सन् 1987 से परमपावन दलाई लामा स्वयं इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। उनका कथन है कि विज्ञान, तकनीक और भौतिक विकास हमारी सारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। हमें अपने भौतिक विकास को करुणा, सहिष्णुता, क्षमा, संतोष और आत्मानुशासन जैसे मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है, जिससे हमारा भौतिक और आंतरिक विकास एकसाथ हो सके। इसी में विकास की पूर्णता है और यही विज्ञान की सार्थकता है। विज्ञान और विकास के संदर्भ में यह पुरातन भारतीय पंरपरा ही विश्व के लिए कल्याण का मार्ग सुलभ करा सकती है।  
डॉ. राहुल मिश्र
        (आकाशवाणी, लेह से दिनांक 09 नवंबर, 2015 को प्रातः 0910 बजे प्रसारित)