Sunday, 15 October 2017

रघुपति भगति सजीवनि मूरी


रघुपति भगति सजीवनि मूरी

रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।
(तुलसीदास कहते हैं कि रघुपति की भक्ति संजीवनी की जड़ की तरह है। यह भक्ति कंद या फल की भाँति सामने दिखाई देने वाली नहीं है। इसी कारण इसे आसानी से पाया नहीं जा सकता। इसे जमीन को खोदकर निकालना पड़ा है। जटिल और कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इसी कारण रघुपति की भक्ति सरल नहीं है, सभी के लिए सुलभ नहीं है। आखिर ऐसे दुर्लभ और जटिल आराध्य रघुपति कौन हैं? उनकी भक्ति, जो संजीवनी मूल या संजीवनी की जड़ की भाँति दुर्लभ और जटिल है, वह कैसी है, और उसे किस प्रकार पाया जा सकता है? उसे पाने के लिए कौन-से प्रयास करने पड़ते हैं और उसे पाने के लिए किस प्रकार की योग्यता की, किन-किन उपरणों की जरूरत पड़ती है? उसका विशद वर्णन बाबा तुलसी ने इस प्रसंग में किया है।)
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ।।
नाथ मोहिं निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी ।।1
हिंदी साहित्येतिहास में भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास की कीर्ति का अक्षय स्रोत श्रीरामचरितमानस है। युगदृष्टा, क्रांतिदर्शी और कालजयी कवि गोस्वामी तुलसीदास की यह कृति रामभक्ति का एक माध्यम-मात्र नहीं है, वरन् इसमें युगानुरूप चेतना के ऐसे तत्त्व विद्यामान हैं, जो भक्तिकालीन स्थितियों-परिस्थितियों से लगाकर वर्तमान तक अपनी प्रासंगिकता को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इसी कारण देश और काल की परिधि में मानस को नहीं बाँधा जा सकता है। जब प्रश्न साहित्य की सामर्थ्य का उठता है, और साहित्य की प्रासंगिकता-उपादेयता को देश-काल-परिस्थिति की कसौटी में परखने का यत्न होता है, तो मानस को सदैव और सर्वत्र खरा पाते हैं। यह अलग विषय है, कि आज की विकृत और कुत्सित मानसिकता ने मानस को जाति-धर्म-वर्ग के दायरे में बाँधकर इसके लोकमंगलकारी और लोककल्याणकारी पक्षों को विस्मृत कर दिया है।
श्रीरामचरितमानस का आकार वस्तुतः रामभक्त तुलसी की दास्यभक्ति भावना से पुष्ट होकर बनता है, किंतु मानस के प्रणयन में प्रारंभ से पूर्णता की ओर चलते हुए राम की कथा जैसे-जैसे अपने चरम पर पहुँचती है, वैसे-वैसे क्रमशः नीति-नियम और जीवन की व्यावहारिकताओं के पक्ष उद्घाटित होने लगते हैं। उत्तरकांड तक पहुँचते-पहुँचते हम उस धरातल पर उतरने लगते हैं, जहाँ रामभक्त तुलसी की लेखनी विशालकाय समाज को उसकी दिशाहीनता, पथभ्रष्टता और असहायता से मुक्त कराने के लिए छटपटाती प्रतीत होती है।
श्रीरामचरितमानस का उत्तरकांड इसी कारण अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। बालकांड से लगाकर लंकाकांड तक जिस मनोभूमि को वे खाद-पानी देकर, उर्वर बनाकर तैयार करते हैं, उसमें बीज बोने का कार्य उत्तरकांड में होता है। यहाँ वे स्वयं उपदेशक की भाँति उपदेश नहीं देते, वरन् संवाद शैली में अपनी बात को रखते हैं। वे उपदेशक, प्रचारक या गुरु के रूप में स्वयं को प्रस्तुत नहीं करते। वे नेपथ्य में रहकर अपनी बात को कहते हैं। उत्तरकांड में संवादों का एक क्रम है। रामकथा से निःसृत नवनीत को लोक तक संप्रेषित करने के क्रम में कागभुशुंडि और लोमश ऋषि का संवाद है, जहाँ सगुण और निर्गुण के मध्य श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता का द्वंद्व चर्चा में आता है। इस संवाद के माध्यम से बाबा तुलसी अत्यंत सरलता के साथ यह स्पष्ट करते हैं, कि माया से आच्छादित रहने वाला जड़ जीव ब्रह्म सदृश नहीं हो सकता।2 अतः सगुण रूप की आराधना और उससे मन के विकारों का शमन ही युगानुरूप, सर्वस्वीकार्य और सहज होगा।
इसके अगले क्रम में कागभुशुंडि और गरुड़ का संवाद आता है। लोमश ऋषि और कागभुशुंडि के मध्य संवाद का अगला चरण कागभुशुंडि और गरुड़ के संवाद में प्रत्यक्ष होता है, जहाँ गरुड़ कागभुशुंडि से निवेदन करते हैं, कि यदि आप मुझ पर कृपावान हैं, और मुझे अपना सेवक मानते हैं, तो कृपापूर्वक मेरे सात प्रश्नों के उत्तर दीजिए। गरुड़ जी प्रश्न करते हैं-
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब तें दुर्लभ कवन सरीरा ।।
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोइ संछेपहिं कहहु बिचारी ।।
संत असंत मरम तुम जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ।।
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ।।
मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ।।3
गरुड़ प्रश्न करते हैं कि हे नाथ! सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है। कौन सबसे बड़ा दुःख है। कौन सबसे बड़ा सुख है। साधु और असाधु जन का स्वभाव कैसा होता है। वेदों में बताया गया सबसे बड़ा पाप कौन-सा है। इसके बाद वे सातवें प्रश्न के संबंध में कहते हैं कि मानस रोग समझाकर बतलाएँ, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।
गरुड़ के प्रश्न के उत्तर में कागभुशुंडि कहते हैं कि मनुष्य का शरीर दुर्लभ और श्रेष्ठ है, क्योंकि इस शरीर के माध्यम से ही ज्ञान, वैराग्य, स्वर्ग, नरक, भक्ति आदि की प्राप्ति होती है।4 वे कहते हैं कि दरिद्र के समान संसार में कोई दुःख नहीं है और संतों (सज्जनों) के मिलन के समान कोई सुख नहीं है।5 मन, वाणी और कर्म से परोपकार करना ही संतों (साधुजनों) का स्वभाव होता है।6 किसी स्वार्थ के बिना, अकारण ही दूसरों का अपकार करने वाले दुष्ट जन होते हैं। वेदों में विदित अहिंसा ही परम धर्म और पुण्य है, और दूसरे की निंदा करने के समान कोई पाप नहीं होता है।7
गरुड़ के द्वारा पूछे गए सातवें प्रश्न का उत्तर अपेक्षाकृत विस्तार के साथ कागभुशुंडि द्वारा दिया जाता है। सातवें और अंतिम प्रश्न के उत्तर में प्रायः वे सभी कारण निहित हैं, जो अनेक प्रकार के दुःखों का कारण बनते हैं। इस कारण बाबा तुलसी मानस रोगों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह तें दुख पावहिं सब लोगा ।।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह तें पुनि उपजहिं बहु सूला ।।
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ।।
प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ।।8
कागभुशुंडि कहते हैं कि मानस रोगों के बारे में सुनिए, जिनके कारण सभी लोग दुःख पाते हैं। सारी मानसिक व्याधियों का मूल मोह है। इसके कारण ही अनेक प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। शरीर में विकार उत्पन्न करने वाले वात, कफ और पित्त की भाँति क्रमशः काम, अपार लोभ और क्रोध हैं। जिस प्रकार पित्त के बढ़ने से छाती में जलन होने लगती है, उसी प्रकार क्रोध भी जलाता है। यदि ये तीनों मनोविकार मिल जाएँ, तो कष्टकारी सन्निपात की भाँति रोग लग जाता है। अनेक प्रकार की विषय-वासना रूपी मनोकांक्षाएँ ही वे अनंत शूल हैं, जिनके नाम इतने ज्यादा हैं, कि उन सबको जानना भी बहुत कठिन है।
बाबा तुलसी इस प्रसंग में अनेक प्रकार के मानस रोगों, जैसे- ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, जलन, दुष्टता, मन की कुटिलता, अहंकार, दंभ, कपट, मद, मान, तृष्णा, मात्सर्य (डाह) और अविवेक आदि का वर्णन करते हैं और शारीरिक रोगों के साथ इनकी तुलना करते हुए इन मनोरोगों की विकरालता को स्पष्ट करते हैं।9
यहाँ मनोरोगों की तुलना शारीरिक व्याधियों से इस प्रकार और इतने सटीक ढंग से की गई है, कि किसी भी शारीरिक व्याधि की तीक्ष्णता और जटिलता से मनोरोग की तीक्ष्णता और जटिलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का रोग प्रत्यक्ष होता है और शरीर में परिलक्षित होने वाले उसके लक्षणों को देखकर जहाँ एक ओर उपचार की प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर व्याधिग्रस्त व्यक्ति को देखकर अन्य लोग उस रोग से बचने की सीख भी ले सकते हैं। सामान्यतः मनोरोग प्रत्यक्ष परिलक्षित नहीं होता, और मनोरोगी भी स्वयं को व्याधिग्रस्त नहीं मानता है। इस कारण से बाबा तुलसी ने मनोरोगों की तुलना शारीरिक रोगों से करके एकदम अलग तरीके से सीख देने का कार्य किया है।
कागभुशुंडि कहते हैं कि एक बीमारी-मात्र से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और यहाँ तो अनेक असाध्य रोग हैं। मनोरोगों के लिए नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान आदि अनेक औषधियाँ हैं, किंतु ये रोग इन औषधियों से भी नहीं जाते हैं।10 इस प्रकार संसार के सभी जीव रोगी हैं। शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग से दुःख की अधिकता हो जाती है। इन तमाम मानस रोगों को विरले ही जान पाते हैं। जानने के बाद ये रोग कुछ कम तो होते हैं, मगर विषय-वासना रूपी कुपथ्य पाकर ये साधारण मनुष्य तो क्या, मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो जाते हैं।11
मनोरोगों की विकरालता का वर्णन करने के उपरांत इन रोगों के उपचार का वर्णन भी होता है। कागभुशुंडि के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर भरोसा करते हुए विषयों की आशा को त्यागकर संयम का पालन करने पर श्रीराम की कृपा से ये समस्त मनोरोग नष्ट हो जाते हैं।12
रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।13
इन मनोरोगों के उपचार के लिए श्रीराम की भक्ति संजीवनी जड़ की तरह है। श्रीराम की भक्ति को श्रद्धा से युक्त बुद्धि के अनुपात में निश्चित मात्रा के साथ ग्रहण करके मनोरोगों का शमन किया जा सकता है। यहाँ तुलसीदास ने भक्ति, श्रद्धा और मति के निश्चित अनुपात का ऐसा वैज्ञानिक-तर्कसम्मत उल्लेख किया है, जिसे जान-समझकर अनेक लोगों ने मानस को अपने जीवन का आधार बनाया और मनोरोगों से मुक्त होकर जीवन को सुखद और सुंदर बनाया।
यहाँ पर श्रीराम की भक्ति से आशय कर्मकांडों को कठिन और कष्टप्रद तरीके से निभाने, पूजा-पद्धतियों का कड़ाई के साथ पालन करने और इतना सब करते हुए जीवन को जटिल बना लेने से नहीं है। इसी प्रकार श्रद्धा भी अंधश्रद्धा नहीं है। भक्ति और श्रद्धा को संयमित, नियंत्रित और सही दिशा में संचालित करने हेतु मति है। मति को नियंत्रित करने हेतु श्रद्धा और भक्ति है। इन तीनों के सही और संतुलित व्यवहार से श्रीराम का वह स्वरूप प्रकट होता है, जिसमें मर्यादा, नैतिकता और आदर्श है। जिसमें लिप्सा-लालसा नहीं, त्याग और समर्पण का भाव होता है। जिसमें विखंडन की नहीं, संगठन की; सबको साथ लेकर चलने की भावना निहित होती है। जिसमें सभी के लिए करुणा, दया, ममता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य जैसे उदात्त गुण परिलक्षित होते हैं। श्रद्धा, भक्ति और मति का संगठन जब श्रीराम के इस स्वरूप को जीवन में उतारने का माध्यम बन जाता है, तब असंख्य मनोरोग दूर हो जाते हैं। स्वयं का जीवन सुखद, सुंदर, सरल और सहज हो जाता है। जब अंतर्जगत में, मन में रामराज्य स्थापित हो जाता है, तब बाह्य जगत के संताप प्रभावित नहीं कर पाते हैं।
इसी भाव को लेकर, आत्मसात् करके विसंगतियों, विकृतियों और जीवन के संकटों से जूझने की सामर्थ्य अनगिनत लोगों को तुलसी के मानस से मिलती रही है। यह क्रम आज का नहीं, सैकड़ों वर्षों का है। यह क्रम देश की सीमाओं के भीतर का ही नहीं, वरन् देश से बाहर कभी गिरमिटिया मजदूर बनकर, तो कभी प्रवासी बनकर जाने वाले लोगों के लिए भी रहा है। सैकड़ों वर्षों से लगाकर वर्तमान तक अनेक देशों में रहने वाले लोगों के लिए तुलसी का मानस इसी कारण पथ-प्रदर्शक बनता है, सहारा बनता है। आज के जीवन की सबसे जटिल समस्या ऐसे मनोरोगों की है, मनोविकृतियों की है, जिनका उपचार अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के पास भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में तुलसीदास का मानस व्यक्ति से लगाकर समाज तक, सभी को सही दिशा दिखाने, जीवन को सन्मार्ग में चलाने की सीख देने की सामर्थ्य रखता है।
संदर्भ-
1. गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 7/1-2/121, पृ. 947,
2. वही, 7/111, पृ. 934,
3. वही, 7/3-7/121, पृ. 947,
4. वही, 7/9-10/121, पृ. 947,
5. वही, 7/13/121, पृ. 947,
6. वही, 7/14/121, पृ. 948,
7. वही, 7/22/121, पृ. 948,
8. वही, 7/28-32/121, पृ. 948,
9. वही, 7/33-37/121, पृ. 949,
10.        वही, 7/दोहा 1-2/121, पृ. 949,
11.        वही, 7/1-4/122, पृ. 949-950,
12.        वही, 7/5-6/122, पृ. 950,
13.  वही, 7/7/122, पृ. 950 
डॉ. राहुल मिश्र

(अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास के जबलपुर अधिवेशन- 2017 में प्रस्तुत एवं साहित्य परिक्रमा के 15वाँ वार्षिक अधिवेशन विशेषांक, अक्टूबर-दिसंबर, 2017 में प्रकाशित)

Friday, 4 August 2017

भूमिका (कृष्णकाव्य के महाकवि : सूरदास)


भूमिका
किधौं  सूर  कौ  सर लग्यौ,  किधौं सूर की पीर ।
किधौं सूर को  पद लग्यौ,  तन मन धुनत सरीर ।।
कृष्णकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि सूरदास के संबंध में कथा प्रचलित है कि एक बार सूरदास और तानसेन की भेंट हो गई। तानसेन ने सूरदास द्वारा गाए जा रहे पद को तन्मयता के साथ सुना और एक सहृदय श्रोता का भावनात्मक-संवेदनात्मक जुड़ाव एक भक्तकवि से हो गया। कला के पारखी के लिए शील साँसों के उतार-चढ़ाव की तरह होता है और विनम्रता शरीर की भाँति। इसी कारण संगीत सम्राट तानसेन के अंतर्मन से पंक्तियाँ प्रस्फुटित हो उठीं। तानसेन कह उठे कि जब किसी तड़पते हुए व्यक्ति को देखता हूँ, तो लगता है कि शायद इसे किसी शूर (योद्धा) का बाण लग गया है अथवा इसे उदर-सूर (शूल) की बीमारी हो गई है या फिर निश्चित ही सूर का कोई पद इसके लग गया है। इसी कारण यह व्यक्ति तड़प रहा है। वस्तुतः यह तड़प संगीत सम्राट तानसेन की ही रही होगी, जो शब्दबद्ध होकर सूरदास की महिमा का गान करने लगी। सूरदास भी कला के पक्के पारखी थे, इसी कारण अकबर के नवरत्न तानसेन की वाणी को सुनकर तुरंत ही कह उठे-
बिधना यह जियँ जानि कै, सेसहि दिये न कान ।
धरा मेरु  सब  डोलि हैं,   तानसेन   की   तान ।।
भक्तकवि सूरदास कह उठते हैं कि विधाता ने यह जान-समझकर शेषनाग को कान नहीं दिए हैं कि यदि तानसेन के गाने को, तानसेन की तान को शेषनाग सुन लेगा; तो उसके थिरक उठने से धरती और मेरु पर्वत, सभी डोलने लगेंगे।
सूर के पदों में गुँथे हुए संगीतशास्त्र के कोमल तंतुओं ने संगीत सम्राट तानसेन को ऐसा कसकर बाँध लिया कि तानसेन के मुख से बरबस ही सूर के पद निकल पड़ते थे। ऐसे ही एक बार अकबर के सामने तानसेन सूरदास का एक पद गा उठे। बादशाह उस पद की सरसता पर मोहित हो गए। उस पद को सुनकर अकबर ने सूरदास से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी। तानसेन ने सूरदास से अकबर की भेंट करा दी। अकबर की सहृदयता से प्रभावित होकर सूरदास ने एक पद अकबर को सुनाया। अकबर ने पद सुनने के बाद कहा कि जिस तरह कृष्ण के यश को गाया है, उसी तरह मेरे भी यश को गाएँ। इस पर सूरदास गाने लगे कि मेरे हृदय में तो केवल नंदनंदन ही बसे हैं और इस कारण मेरे हृदय में किसी दूसरे के बसने का स्थान ही नहीं है। तब मैं आपका यश कैसे गाऊँ?
नाहिन रह्यो हिय महँ ठौर । नंदनंदन अछत आनिए डर और ।।
‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में अकबर और सूरदास की भेंट का वर्णन मिलता है। इसमें गोसाईं हरिराय उल्लेख करते हैं कि यह भेंट तानसेन ने संवत् 1633 (सन् 1576 ई.) के आसपास कराई थी। कई विद्वान इस घटना की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। भले ही यह घटना ऐतिहासिक न हो, मगर लोकपरंपरा में प्रचलित इस किंवदंती पर पूरी तरह से अविश्वास कर लेना भी उचित नहीं है। यहाँ प्रश्न इस घटना की सत्यता को जाँचने का नहीं है, प्रत्युत् इसके माध्यम से कृष्णकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि सूरदास के कृतित्व और व्यक्तित्व की महानता को देख लेने का है।
सूरदास के प्रति तानसेन का निर्मल-पवित्र अनुराग, तानसेन की सूरदास के प्रति विनम्रता और आस्था ही उस कारण को जन्म दे सकी, जिससे सूरदास ने तानसेन के संदर्भ में ‘नाहिन रह्यौ हिय महँ ठौर’ नहीं कहा, वरन् शेषनाग को भी नचा देने वाली तान छेड़ने वाले संगीत-साधक तानसेन कहकर महिमामंडित कर दिया। यह प्रीति, यह जुड़ाव भय के कारण नहीं, वरन् आत्मीय संबंध के कारण है, जो आत्मा के काव्य के साथ आत्मा के संगीत को जोड़ता है। सूरदास आत्मा की बात को आत्मा से कहने वाले ऐसे विरले कवि हैं, जो अंतर्मन की गहराई में उतरकर शब्दों को जिह्वा तक लाते हैं और वीणा की सुरीली-मधुर झनकार के साथ मिलाकर एक ओर बाह्यजगत् को उद्वेलित कर देते हैं, तो दूसरी ओर अंतर्मन के तारों को झंकृत करके बुद्धि को निर्मल और प्राण को पुलकित कर देते हैं। अंतर्मन से बाह्यजगत् तक की यह वृत्ताकार गति उस मोक्ष तक पहुँचा देती है, जिसकी प्राप्ति की कामना साधारण मानव से लेकर साधक तक को होती है।
कृष्णकाव्य परंपरा का विस्तार लगभग सारे देश में रहा है और विभिन्न संप्रदायों के भक्तकवियों ने कृष्णकाव्य परंपरा को समृद्ध किया है। वल्लभ संप्रदाय (श्री वल्लभाचार्य, तेलुगु), चैतन्य संप्रदाय (चैतन्य महाप्रभु, नवद्वीप, बंगाल) और राधावल्लभ संप्रदाय (श्री हित हरिवंश) का आश्रय लेकर कृष्णकाव्य परंपरा विकसित हुई। उस समय बने नैराश्य के वातावरण के कारण बहुसंख्य जनता में जीवन के प्रति जागृत हो गई विरक्ति को नष्ट करके जीवन के प्रति अनुराग जगाने का काम इस पंरपरा के कृष्णभक्त कवियों ने किया। सूरदास इस परंपरा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं, किंतु सूरदास ने एकदम अलग ही रास्ता बनाया, जहाँ ब्रजभाषा में कृष्ण-भक्ति, काव्य और संगीत की त्रिवेणी का दर्शन होता है; जहाँ प्रेम, भक्ति और अध्यात्म एक-दूसरे से मिल जाते हैं और आराधक-आराध्य का भेद भी नहीं रह जाता है।
सूर की एक अन्य विशिष्टता है- गृहस्थ जीवन और परिवार के चित्रों को उकेरना। रामायण और महाभारत के केंद्र में भी परिवार हैं। वहाँ राजपरिवारों के संघर्ष का यथातथ्य चित्रण क्रमशः नीति-नैतिकताओं और मर्यादों को विश्लेषित करता है। परिवार सूरदास के मुक्तक पदों में भी है, मगर वह सामान्य किसान का परिवार है। वहाँ नंद, यशोदा, कृष्ण और बलराम हैं। वहाँ परिवार के साथ जीवनधारा बनकर चलता गौवंश है, नेह-प्रेम में डूबे हुए गोप हैं, गोपियाँ हैं और राधिकाजी हैं। वहाँ परिवार के संघर्ष नहीं, आस-पड़ोस के झगड़े-टंटे नहीं, वरन् कन्हैया की बाललीलाएँ हैं, खेल हैं, हँसी-ठिठोलियाँ हैं, रार-मनुहार हैं और भोले-भाले-से ताने-उलाहने हैं। आगे चलकर वियोग के पक्ष के साथ सूरदास उतने ही ज्यादा दार्शनिक हो जाते हैं; जितना बचपना, जितनी खिलखिलाहट वे कृष्ण के बचपन की बिखेरते हैं। परिवार के माध्यम से चलते हुए तब ऐसा प्रतीत होता है, मानों वे एक छोटे-से परिवार के प्रति अपने दायित्व को निभाते हुए किसी बड़े परिवार की जिम्मेदारी को निभाने में लग गए हों- निर्गुनिया, निरंजनी, नाथपंथी साधुओं और आक्रांताओं के धर्म से भागवत-भक्ति को बचाने की। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग को अपनी वीणा की सुरीली और मधुर झंकार से प्रसृत करके सूरदास ने जिस तरह सगुणोपासना के मार्ग को प्रशस्त किया है, वह अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है।
एक प्रसंग आता है, गोस्वामी गोकुलनाथ द्वारा रचित चौरासी वैष्णवन की वार्ता में; कि एक बार महाप्रभु वल्लभाचार्य मथुरा के गऊघाट में कुछ दिनों के लिए टिके थे। वहीं पर सूरदास का निवास भी था। सूरदास को जब वल्लभाचार्य जी के आगमन का पता चला, तो वे मिलने पहुँच गए। उस समय वल्लभाचार्य जी भोजन ग्रहण करके गद्दी में विराजमान थे। वल्लभाचार्य जी ने भी सूरदास की प्रशंसा सुन रखी थी, इस कारण उन्होंने कोई पद गाने के लिए कहा। सूरदास ने ‘हरि हौं सब पतितन कौ नायक...’ गाया। बाद में ऐसे ही कुछ अन्य भजन भी सुनाए। सूरदास के पद सुनकर वल्लभाचार्य जी ने कहा कि- ‘सूर ह्वै कै ऐसों घिघियात काहै कों हौं, कछू भगवत्-लीला वर्णन करि।’ सूरदास ने इस पर अपनी अज्ञानता प्रकट की। उसी समय महाप्रभु ने उन्हें दीक्षित करके श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का प्रवचन दिया। इसके बाद दास्यभाव को तजकर सूरदास सख्यभाव के, वात्सल्य-भाव के पद रचने लगे। तुलसीदास की भक्ति दास्यभाव वाली है। उपास्य और उपासक के मध्य जितनी रिक्तता तुलसी की रचनाओं में मिलती है, उतनी ही सघनता उपास्य और उपासक के बीच सूरदास के पदों में मिलती है। सख्यभाव और वात्सल्य-भाव सूरदास को जितना आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न बनाते हैं, उतना अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। इसी कारण लोकव्यवहार में प्रचलित है कि-
तत्त्व तत्त्व  सूरा  कही,  तुलसी  कही  अनूठी ।
बची-खुची कबिरा कही, और कही सो जूठी ।।
आत्मा के काव्य के सर्जक, लोक-रंजना के आराधक और काव्याकाश में सूर्य की भाँति अपने अध्यात्म के प्रकाश से आलोकित होने वाले भक्तकवि सूरदास की ख्याति भौगौलिक बंधनों और काल की सीमाओं से परे है। उनकी सर्जना हर युग में, प्रत्येक कालखंड में जीवन जीने की ऊर्जा देने वाली है और जीवन की नकारात्मक शक्तियों को पराजित करने की सामर्थ्य भी रखती है। आज के जटिल जीवन में भक्तकवि सूरदास का स्मरण इसी कारण प्रासंगिक है। साहित्य की विविध धाराओं और नवसृजित विषयों-चिंतनधाराओं-वैचारिकताओं के बीच सूरदास को स्मरण कराने का यह प्रयास निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रेरणा के कारण ही संभव हो सकता है, और इस हेतु पुस्तक के संपादक डॉ. अशोक मर्डे अशेष साधुवाद के पात्र हैं। हिंदी की सेवा के लिए उनका यह अवदान कभी विस्मृत नहीं होगा।  
डॉ. राहुल मिश्र

(कृष्णकाव्य के महाकवि : सूरदास, संपादक- डॉ. अशोक मर्डे, प्रकाशक- शिल्पा प्रकाशन, शिव-कांची, बिदर रोड, उदगीर- 413 517 की भूमिका)

Monday, 26 June 2017

अनौपचारिक जनसंचार माध्यम के रूप में नाटक मंडलियाँ : एक अध्ययन


अनौपचारिक जनसंचार माध्यम के रूप में नाटक मंडलियाँ : एक अध्ययन

एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अर्थपूर्ण संदेशों का संप्रेषण ही जनसंचार होता है। (डेनिस मेकबेल)
विशेषीकृत समूहों द्वारा तकनीकी साधनों- प्रेस, रेडियो, टेलिविज़न, फिल्म आदि के द्वारा व्यापक असमरूप और बिखरे हुए श्रोताओं, दर्शकों तक संकेतों का प्रसार ही जनसंचार है। (जैने बिट्ज)
इस प्रकार जनसंचार को एक विस्तृत प्रक्रिया कहा जा सकता है। संचरण की प्रक्रिया समस्त प्राणियों में होती है, मगर मनुष्य के लिए यह एक विशिष्ट प्रक्रिया है, क्योंकि उसने अपनी क्षमताओं और बुद्धि-बल के विस्तार द्वारा इस प्रक्रिया को अन्य जीवधारियों की संचरण की प्रक्रिया से श्रेष्ठ और विशिष्ट बनाया है। सामान्य रूप से संचरण के अंतर्गत व्यवहार, संपर्क और परस्पर आदान-प्रदान को रखा जाता है। व्यवहार, संपर्क और परस्पर आदान-प्रदान की प्रक्रियाएँ व्यापक जनसमुदाय के साथ जुड़कर जनसंचार कहलाने लगती हैं। संचार के साथ ‘जन’ का जुड़ जाना इसके व्यापक अर्थों को प्रकट करता है और इसकी एक विशिष्ट प्रवृत्ति को प्रकट करता है। इसे स्पष्ट करते हुए डॉ. राजेंद्र मिश्र लिखते हैं कि-  जनसंचार की अपनी विशेषताएँ होती हैं। सामाजिक परिवर्तन की जटिल प्रक्रिया को अंकित करना इसके केंद्र में होता है। मार्क्स ने भी कहा है कि समाज में परिवर्तन का कारण अधिकतर आर्थिक होता है। यही कारण है कि औद्योगिक क्रांति के बाद सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया भी सामने आई है। समाज में ये परिवर्तन आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के होते हैं। जनसंचार की इसमें व्यापक भूमिका भी होती है। जनसंचार किसी भी उन्नत समाज की लंबी सांस्कृतिक परंपरा को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।1 इस प्रकार जनसंचार अपने विशिष्ट अर्थों में समाज, संस्कृति, मानव-विकास और मानव-जीवन से संबद्ध है।
‘मॉस मीडिया इन मॉडर्न सोसायटी’, पिटरसन और जैक्सन की प्रमुख पुस्तक है, जिसमें जनसंचार की पाँच विशेषताएँ बताई गई हैं-
1.   जनसंचार एकतरफा होता है, जिसमें संदेश स्रोत से संग्राहक की ओर और संग्राहक से स्रोत की ओर प्रवाहित होते हैं और इसका फीडबैक लिया जाता है।
2.   इसमें चयन की दोहरी प्रक्रिया होती है। एक ओर तो जन-माध्यम के रूप में सभी लोग इसके संग्राहक होते हैं और यह तय करना पड़ता है कि उन्हें किस रूप में संदेश दिया जा सकता है। इस तरह जनसंचार अपने संग्राहकों का चयन करता है।
3.   जनसंचार के विकसित माध्यम के कारण समाचार पत्रों को तुरंत समाचार और फोटो पहुँच जाते हैं, जिन्हें प्रकाशित किया जाता है। यह एक तीव्र प्रक्रिया है।
4.   जनसंचार संप्रेषित संदेशों को बड़ी संख्या में लोगों को ग्रहण कराता है।
5.   जनसंचार सामाजिक संस्थान की तरह है और वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।2
इन विशिष्टताओं से युक्त जनसंचार जिन माध्यमों के द्वारा संपन्न होता है, वे जनसंचार माध्यम कहलाते हैं। आज के तकनीकी और वैज्ञानिक युग में जिस प्रकार जनसंचार का अपना विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ है, उसी प्रकार जनसंचार माध्यमों की भी अपनी विशिष्ट परिभाषा है। अपने विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ में जनसंचार माध्यमों को अलग-अलग वर्गों के द्वारा जाना जाता है। इसमें शब्द-संचार माध्यम अथवा मुद्रण माध्यम के अंतर्गत समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि आती हैं। श्रव्य-संचार माध्यम के अंतर्गत रेडियो, ऑडियो कैसेट्स आदि आते हैं। दृश्य-संचार माध्यमों के अंतर्गत टेलिविज़न, वीडियो कैसेट्स, फिल्म आदि का उल्लेख किया जा सकता है। नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के अंतर्गत उपग्रह प्रणाली और कंप्यूटर, इंटरनेट आदि को रखा जा सकता है। अपने रूढ़ और पारिभाषिक अर्थों में इन्हीं जनसंचार माध्यमों का अध्ययन किया जाता है।
पिटरसन और जैक्सन द्वारा बताई गई जनसंचार की विशेषताओं के आधार पर आधुनिक सूचना और संचार की तकनीकों का अनुशीलन किया जाता है। इन तकनीकों के प्रचलन से पहले के कालखंड पर विचार करने पर नाटक मंडलियों या रंगमंच के रूप में जनसंचार के अनौपचारिक माध्यम की रोमांचकारी उपस्थिति अनुभूत होती है। पिटरसन और जैक्सन द्वारा बताई गई विशेषताएँ जनसंचार के इस अनौपचारिक माध्यम में भी कमोबेश देखी जा सकती हैं। इसी कारण नाटक मंडलियों को अनौपचारिक जनसंचार माध्यम माना जा सकता है। इन्हें अंतर-वैयक्तिक संचार माध्यम भी कहा जाता है, क्योंकि इनमें संचार बिना किसी यांत्रिक उपकरण की मध्यस्थता के, आमने-सामने होता है।3
नाट्य-परंपरा आदिम मानव के सभ्य होने की कथा को भी व्याख्यायित करती है। इसे बताते हुए रघुवरदयाल वार्ष्णेय लिखते हैं कि- बड़े-बड़े कारखानों, छोटे-छोटे लघु उद्योग धंधों और खेतों में दिनभर कड़ी मेहनत करके उत्पादन करने में व्यस्त रहता हुआ आदमी जब रात्रि को अवकाश पाता था, तब थकान मिटाने के लिए नाटक, वृत्त और नृत्य प्रदर्शन द्वारा अपना मनोरंजन करता था। इसी सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकता के कारण ही विलास और ऐश्वर्य में डूबे इंद्र ने नाट्यवेद को ग्रहण करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी और सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि भरत ने अपने सौ पुत्रों सहित इसे लोककल्याण के लिए धारण किया था और इसमें केवल भारती, सात्वती और आरभटी वृत्तियों को साकार किया था, जो उस समय की मेहनतकश जातियों की प्रवृत्ति थी, क्योंकि इन वृत्तियों का संबंध भरत, सत्वत और अरभट जातियों से था। ये जातियाँ आर्टीजन क्लास की थीं और आम आदमी का जीवन जीती थीं।4
इस प्रकार नाट्य-शास्त्र और नाट्य परंपरा की उत्पत्ति व विकास आदिम मानव के सभ्य होते जाने की, उसके विचारवान होते जाने की प्रवृत्तियों का द्योतक भी है और आदिम मानव के संघर्षों में उसके साथ संलग्न रहने की स्थितियों को भी प्रकट करता है। अलग-अलग कालखंडों में नाट्य-परंपरा भले ही मनोरंजन की भूमिका को कम या ज्यादा निभाती रही हो, मगर उसका घनिष्ठ और सीधा संबंध लोक-हित से रहा है, लोक की जागृत चेतना से रहा है। इसी कारण नाट्य-परंपरा की संवाहक नाटक मंडलियों को जनसंचार के अनौपचारिक माध्यम या अंतर-वैयक्तिक संचार माध्यम की श्रेणी में रखा जा सकता है।
औपनिवेशिक भारत में नाट्य-मंडलियों को सर्वथा नवीन भूमिका में देखा जा सकता है। हिंदी नाट्य-विधा को नए कलेवर के साथ स्थापित करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र से पूर्व नाट्य-विधा और इसके मंचन की परंपरा शिष्ट साहित्य और अभिजात्य वर्ग, दोनों के लिए अछूत जैसी ही थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ जुड़ा हुआ यह सर्वथा विलक्षण पक्ष है कि उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ नाट्यशास्त्र के जटिल और रूढ़ बंधनों को तोड़कर नाट्य-मंडलियों को जन-जागरण का सशक्त हथियार बनाया। वे नयी नाट्य-परंपरा, अलग नाट्य-शिल्प और रंगमंच की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत भी रहे और थियेटर्स की बँधी-बँधाई परिधि को तोड़कर समाज के करीब लाने के लिए प्रयासरत भी रहे। भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिए इस अभिनव प्रयोग की जमीन तत्कालीन नाटक मंडलियों ने ही तैयार की थी, जिन्हें शिष्ट और संभ्रांत वर्ग में हेय दृष्टि से देखा जाता था। भारतेंदु हरिश्चंद्र स्वयं पारसी नाटक मंडली द्वारा अभिनीत शकुंतला नाटक में दुष्यंत और शकुंतला के फूहड़ प्रदर्शन को देखकर विचलित हो उठे थे। इस तरह नाटक मंडलियों के दो अलग-अलग रूप उस दौर में दिखाई पड़ते हैं। एक को स्तरहीन और फूहड़ कहा जाता था, और दूसरा शुद्धतावाद से पूर्ण माना जाता था। गुलाम भारत में एक वर्ग और भी था, जहाँ विक्टोरियन शैली के नाटक खेले जाते थे। यहाँ इस तीसरे वर्ग की विवेचना अपेक्षित नहीं है, क्योंकि इस वर्ग का संबंध सीधे अंग्रेज अधिकारियों एवं कर्मचारियों से, और अंग्रेजी में मंचन किए जाने वाले नाटकों से है।
अव्यवसायी नाटक मंडलियों की शुरुआत सन् 1898 में प्रयाग में ‘श्रीरामलीला नाटक मंडली’ की स्थापना के साथ होती है। इस मंडली का प्रमुख उद्देश्य था- रामलीला प्रसंग से वर्तमान राजनीति की आलोचना करना। इस मंडली ने सबसे पहला नाटक पं. माधव शुक्ल कृत ‘सीता स्वयंवर’ अभिनीत किया।5 इस नाटक में कविता के माध्यम से वीर भारतीय युवकों को उनके पराक्रमहीन होने पर लताड़ते हुए उनके अंदर जोश जगाने का काम किया गया था। अनेक उतार-चढ़ावों के बीच कई अव्यावसायिक नाटक मंडलियों की स्थापना होती रही, ये मंडलियाँ भंग होती रहीं और नई-नई मंडलियाँ बनती रहीं। इन सबके बीच भारतेंदु नाटक मंडली, काशी नागरी नाटक मंडली, हिंदी नाट्य मंडली, रंगवाणी- प्रयाग, आदर्श कला मंदिर- प्रयाग, इप्टा, भारतीय नाट्य संघ, हिंदू यूनियन क्लब, श्री भारत मनोरंजनी सभा और हिंदी नाटक समाज- आगरा जैसी अनेक अव्यवसायी नाटक मंडलियों का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक समस्याओं, कुप्रथाओं और कुरीतियों के खिलाफ जन-जागरण के साथ ही भारतीय नवजागरण के लिए, अंग्रेजों के खिलाफ जन-जागरूकता के लिए कार्य करना था। जनसंचार के अनौपचारिक माध्यम के रूप में इसी कारण तमाम अव्यवसायी नाटक मंडलियों का उल्लेखनीय योगदान माना जा सकता है।
अव्यवसायी नाटक मंडलियों ने व्यावसायिक नाटक मंडलियों को भी प्रभावित किया। अंग्रेजों के साथ भारतीय अभिजात्य वर्ग में लोकप्रिय ‘विक्टोरियन शैली’ के नाटकों से प्रेरित होकर पारसी व्यापारियों ने एकदम अलग किस्म की नाटक मंडलियों को स्थापित किया। व्यावसायिक दृष्टिकोण से स्थापित किये गए इन पारसी रंगमंचों में भारतीय संस्कार और भारतीय लोक-कला के, लोक-संगीत के अंश शामिल थे। इनका पहला उद्देश्य धन कमाना था, मगर बाद में बदलते सामाजिक स्वरूप को, नवजागरण की स्थितियों को, और लोगों के रुझान को आत्मसात् करते हुए ये नाटक मंडलियाँ सामाजिक संदर्भों से, सामयिक अनिवार्यताओं से जुड़ने लगीं। यह बदलाव अव्यवसायी नाटक मंडलियों के प्रभाव से भी आया। इस काल के नाटककार एक साथ तीन परिदृश्यों को जनता के सामने प्रस्तुत करने में पूर्ण सफल हो रहे थे- अंग्रेजी राज्य के अत्याचार, भारतीयों में जागृति और गांधी, गोखले, तिलक आदि के व्यक्तित्व की झलक। ये सब पौराणिक कथाओं के बीच से व्यक्त किया जाता था।6
पारसी रंगमंच में आए इस बदलाव को नारायणप्रसाद बेताब, आगा हश्र कश्मीरी और राधेश्याम कथावाचक की त्रयी के आगमन के साथ खुलकर देखा जा सकता है। मारधाड़, जादू-टोना, रहस्य-रोमांच की प्रस्तुति से निकलकर भारतीय समाज की आजादी की छटपटाहट को  पारसी रंगमंच ने समझा और अपने सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए स्वयं आगे भी आया। देश-भर में भ्रमण करने वाली और वर्ष-पर्यंत अपनी नाट्य-प्रस्तुतियाँ देने वाली पारसी नाटक मंडलियों ने जब इस दायित्व को संभाला, तब समाज में इसके प्रभाव भी परिलक्षित होने लगे। राधेश्याम कथावाचक पारसी रंगमंच के इसी प्रभाव का रोचक वर्णन करते हुए अपने एक संस्मरण में लिखते हैं कि- काशी में हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु धन-संग्रह अभियान चल रहा था। इस अभियान के तहत महामना मदनमोहन मालवीय, दरभंगा नरेश, शिवप्रसाद गुप्त और दीनदयालु शर्मा के साथ कई गणमान्य व्यक्ति बरेली पहुँचे। इस अभियान के लिए राधेश्याम कथावाचक ने आठ-दस गीत लिखे। इन गीतों को गाया गया और गीतों से प्रभावित होकर बरेली की जनता ने  कई हजार रुपये दान में दिये।7 उनके द्वारा लिखा गया एक गीत निम्न है-
हिलमिल करो जाति-उद्धार, भाइयो समय न बारम्बार ।
कोटिपती दें लक्ष-लक्ष, लखपती हज़ार-हज़ार ।
मध्यम श्रेणी देंय सैकड़ों, निर्धन के दो-चार।
हमें दो पैसे भी स्वीकार- भाइयो, समय न बारम्बार-
विक्टोरिया नाटक मंडली उस समय की प्रसिद्ध पारसी नाटक मंडली थी। यह नाटक मंडली प्रायः समाज-हित के कार्यों हेतु धन-संग्रह करने के लिए नाटकों के मंचन किया करती थी। इसके साथ ही धर्मार्थ-कार्यों हेतु मुफ्त में भी मंचन किया करती थी।8  पारसी नाटक मंडलियाँ धर्मार्थ-कार्यों में सहयोग के लिए जितना तत्पर रहती थीं, उतनी ही सक्रियता सामाजिक आंदोलनों में, नवजागरण में भी होती थी। इसके उदाहरण कई नाटकों में देखने को मिलते हैं। अंग्रेज हुक्मरानों की पैनी नज़र से स्वयं को बचाते हुए नाटक मंडलियों के कलाकार और लेखक सामाजिक प्रश्नों को दर्शकों के सामने रख देते थे। मनोरंजन के माध्यम से जन-जागरण के संदेशों का प्रसारण इन नाटक मंडलियों का अनूठा और सुखद पक्ष बन गया था। इसी संबंध में गरीब हिंदुस्तान उर्फ़ स्वदेशी तहरीक नामक पारसी नाटक का उल्लेख किया जा सकता है, जिसमें स्वदेशी आंदोलन के साथ ही स्त्री-शिक्षा की नसीहत को बड़ी कुशलता के साथ पेश किया गया है। इस नाटक के एक गीत के बोल हैं-

जो चाहो ज़िंदगी  अब  भी  खरीदो अपनी चीजों को ।
हुनर सिखलाओ घर के जाहिलों को बदतमीजों को ।।
पढ़ाओ इल्म अपनी  बीवियों को और  कनीज़ों को ।।9
इस प्रकार पारसी नाटक मंडलियाँ जनसंचार के अनौपचारिक या अंतर-वैयक्तिक माध्यम के रूप में न केवल सक्रिय रही हैं, वरन् जनसंचार माध्यमों के उद्देश्यों को पूर्ण करने का कार्य भी करती रहीं हैं। जिस प्रकार शिष्ट-साहित्य और लोक-साहित्य की विविध विधाएँ अपने सामाजिक दायित्व को निभाती रहीं हैं, उसी प्रकार पारसी नाटक मंडलियों ने भी अपनी जिम्मेदारी को निभाया है। इसके बावजूद पारसी नाटक मंडलियाँ उस सम्मान को नहीं पा सकीं, जिसकी वे हकदार थीं। साहित्य के इतिहासकारों ने नाटकों की इस विस्तृत दुनिया को असाहित्यिक कहकर उसकी उपेक्षा की तथा हिंदी रंगमंच के इस लोकप्रिय विधान को नाटक के तत्त्वों से रहित बताया। परंतु बात ऐसी नहीं है। पारसी रंगमंच के नाटकों ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास तथा उसकी समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इनका तथ्यात्मक मूल्यांकन इतिहास की सुरक्षा की दृष्टि से तो आवश्यक है ही, इस कालखंड की नाट्य-विषयक गतिविधियों से परिचित होने के लिए भी आवश्यक है।10 शुद्धतावादियों और परंपरावादियों के लिए जनसंचार माध्यम के रूप में व्यावसायिक या अव्यावसायिक नाटक मंडलियों को स्वीकार करना सहज नहीं रहा है। आधुनिकताबोध ने इस दृष्टि को भी बदला है। इसके लिए लक्ष्मेंद्र चोपड़ा के कथन पर विचार करना होगा। वे लिखते हैं कि- लोक माध्यम या फ़ोक मीडिया मूलतः ऐसे माध्यम हैं, जिनका प्रत्यक्ष संबंध पंरपरागत संस्कृति से है। सामाजिक संदर्भ में संस्कृति पर विचार करते हुए रेमंड विलियम्स ने संस्कृति को सार्थकता की ऐसी व्यवस्था कहा है, जिसके माध्यम से सामाजिक व्यवस्था का अनुभव, संप्रेषण, पुनरुत्पादन और अनुसंधान संभव होता है। ये पारंपरिक लोक-माध्यम संदियों से संदेशों का संचार कर रहे हैं। लोकनाट्य, लोकगीत, लोकनृत्य, तथा मौखिक लोकसाहित्य जैसे पारंपरिक लोक-माध्यम तथा आज के इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यमों के समन्वित प्रयोगों से विकासशील देशों में विकास संचार के क्षेत्र में अभिनव सफलता प्राप्त हुई है।11
सिनेमा और नुक्कड़ नाटक जैसी विधाएँ पारसी रंगमंच से अपना जीवन पाई हैं। ये विधाएँ जनसंचार माध्यम के रूप में आज जितनी प्रभावी और समर्थ हैं, उतनी ही सामर्थ्य इन विधाओं को जन्म देने वाली नाटक मंडलियों में भी है। सूचना-संचार क्रांति के इस दौर में नाटक मंडलियों को उनकी नवीन भूमिका में देखना होगा और उनसे रस-संचय करके आधुनिक जनसंचार माध्यमों को समृद्ध करना होगा।
संदर्भ-
1.   डॉ. राजेंद्र मिश्र, जनसंचार माध्यम, प्रयोजनमूलक हिंदी और जनसंचार, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2010, पृ. 28,2.   वही, पृ. 266,3.   लक्ष्मेंद्र चोपड़ा, संचार का अर्थ व प्रक्रिया, जनसंचार का समाजशास्त्र, आधार प्रकाशन, पंचकूला, प्रथम सं. 2002, पृ. 31-32,4.   रघुवरदयाल वार्ष्णेय, रंगमंच की भूमिका और हिंदी नाटक, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1979, पृ. 94,5.   रघुवरदयाल वार्ष्णेय, अव्यवसायी रंगमंच, रंगमंच की भूमिका और हिंदी नाटक, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1979, पृ. 284,6.   रघुवरदयाल वार्ष्णेय, पारसी रंगमंच, रंगमंच की भूमिका और हिंदी नाटक, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1979, पृ. 276,7.   पं. राधेश्याम कथावाचक, तरुणावस्था (पूर्वार्द्ध), मेरा नाटक-काल, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2004, पृ. 43,8.   सोमनाथ गुप्त, पारसी नाटक मंडलियाँ, पारसी थियेटर : उद्भव और विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1981, पृ. 116-117,9.   सोमनाथ गुप्त, पारसी रंगमंच के कुछ उर्दू नाटककार, पारसी थियेटर : उद्भव और विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1981, पृ. 59,10.   भवानीलाल भारतीय, सिनेमा पूर्व का रंगमंचीय परिदृश्य, बॉलीवुडनामा, सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 2011, पृ. 203,11.   लक्ष्मेंद्र चोपड़ा, जनसंचार माध्यम : सामाजिक अवधारणा, कार्य व सिद्धांत, जनसंचार का समाजशास्त्र, आधार प्रकाशन, पंचकूला, प्रथम सं. 2002, पृ. 40-41 ।
डॉ. राहुल मिश्र

(कला, विज्ञान वाणिज्य महाविद्यालय, मनमाड (महाराष्ट्र) में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद- 2016 हेतु प्रस्तुत शोध-पत्र)

Friday, 2 June 2017

मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं




मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं

बुंदेलखंड का विंध्य अंचल अपने अतीत से ही अनेक पुरा-कथाओं और मिथकों का केंद्र रहा है। यहाँ कण-कण में ऐसी रोमांचकारी कथाएँ बसी हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्य में भी डाल देती हैं और अपने आकर्षण में जकड़ भी लेती हैं। बाँदा जनपद के कालंजर दुर्ग के माहात्म्य को जानने वाले इतना अवश्य जानते होंगे की शैव-साधना का यह केंद्र एक रात में ही बनकर तैयार हो गया था। देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा ने कालंजर के दुर्ग को एक रात में ही बना दिया था, ऐसी मान्यता है। कालंजर के साथ ही कालंजर के पूर्वोत्तर की ओर लगभग सोलह मील दूर मड़फा का दुर्ग भी उसी रात बनना शुरू हुआ था, जिस रात कालंजर का निर्माण हो रहा था। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जी ने पहले कालंजर का दुर्ग बनाया और उसके तैयार हो जाने के बाद मड़फा के दुर्ग को बनाने का काम शुरू किया। रात बीत गई और मड़फा दुर्ग के पूरी तरह से नहीं बन पाने के कारण यह अधूरा ही रह गया। और वास्तव में यह दुर्ग कभी पूरी तरह से नहीं बन पाया। लोक-जीवन में जीवित यह कथा आज भी मड़फा की वीरानियों में गूँजती है। मड़फा दुर्ग का यह अधूरापन आज भी महसूस किया जा सकता है। इसकी वीरानियों में गुलज़ार होने की कसक आज भी महसूस होती है और इसी कारण बरबस ही लगता है कि यदि यह दुर्ग अधूरा न होता, तो शायद कालंजर से भी सुंदर, मोहक और आकर्षक होता। छत्रपति शिवाजी महाराज के शिवनेरी दुर्ग की भाँति अगम्य ऊँचाई में बना यह दुर्ग इतना समर्थ होता, कि कभी कोई आक्रांता इसे जीत नहीं पाता। वैसे भी इस दुर्ग को अजेय ही कहा जा सकता है, क्योंकि सन् 1780 में छछरिहा के युद्ध के पहले तक इस दुर्ग को जीतने में कोई सफल नहीं हो सका था। पन्ना के बघेल राजा हरिवंश राय और बाँदा के नवाब के बीच हुए छछरिहा के संग्राम के बाद यह दुर्ग अपना अस्तित्व खोता गया।
ऐसी मान्यता है कि महर्षि अर्थवर्ण का आश्रम मड़फा में ही था। महर्षि महाअर्थवर्ण को अथर्वा के नाम से भी जाना जाता है और उनके कारण ही चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद को जाना जाता है। महर्षि अथर्वा की पहचान महर्षि वेदव्यास के श्वसुर के रूप में, और इसी कारण मड़फा को वेदव्यास की ससुराल के रूप में भी जानते हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘कृष्ण द्वैपायन व्यास’ में उल्लेख किया है कि एक बार महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती से मिलने के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान- ग्राम हस्तम, जनपद बाँदा) जा रहे थे। रास्ते में वाग्मती नदी (वर्तमान- बागे नदी, बदौसा, बाँदा) के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें पकड़कर मारपीट शुरू कर दी, जिस कारण वेदव्यास बेहोश हो गए। वहाँ से गुजरते हुए महाअर्थर्वण के शिष्यों ने महर्षि व्यास की दयनीय दशा को देखा और उन्हें उठाकर महाअर्थवर्ण के आश्रम में ले आए। महाअर्थवर्ण की पुत्री वाटिका ने बड़ी लगन के साथ महर्षि व्यास की सेवा-सुश्रुषा की। बाद में महर्षि व्यास ने वाटिका से विवाह कर लिया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे व्यासपुत्र सुखदेव के नाम से जाना जाता है।
अपनी जर्जर काया को आयुर्वेद की चिकित्सा के माध्यम से युवा कर लेने वाले महर्षि च्यवन का आश्रम भी मड़फा में था, ऐसी मान्यता है। चरक संहिता सहित आयुर्वेद की अनेक पुस्तकों के रचयिता और सुप्रसिद्ध वैद्य चरक ऋषि का आश्रम भी मड़फा में ही था। लोक-प्रचलित कथाओं और मिथकों का अनूठा संगम मड़फा में देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है कि माण्डव्य ऋषि के आश्रम से इस स्थान का नाम मड़फा पड़ा है। माण्डव्य ऋषि के आश्रम में कण्व ऋषि समेत अनेक ऋषि रहा करते थे। दुष्यंत और शकुंतला की पुरा-ऐतिहासिक गाथा के पुष्पन-पल्लवन का स्थान भी यही माना जाता है। दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा लोकजीवन से आश्रय पाकर आज भी कण-कण में गूँजती है। कण्व ऋषि की पालित पुत्री शकुंतला के पुत्र भरत ने मड़फा में ही शेर के दाँत गिने थे। राजा दुष्यंत के उत्तराधिकारी के रूप में अपने राज्य का विस्तार करके उसने ऐसे प्रतापी शासक का गौरव प्राप्त किया, जिसके नाम पर भरतखंड और भारतवर्ष को जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास भरत के नाम से अनेक गाँव हैं, जो इस कथा के पुष्ट और सच होने को आश्रय प्रदान करते हैं। वेदव्यास के नाम से विकृत होकर बना वतर्मान का बदौसा और भरतकूप के निकट स्थित व्यासकुंड आदि के माध्यम से मड़फा परिक्षेत्र की पौराणिकता को प्रमाणित किया जा सकता है।

समुद्रतल से 1240 फीट ऊँचाई पर स्थित मड़फा के दुर्ग में गुप्तकालीन स्थापत्य के साथ ही चंदेलकालीन स्थापत्य की जर्जर उपस्थिति ही सही, मगर यह इस दुर्ग की प्राचीनता को, और साथ ही इसकी भव्यता को बखानती जरूर है। मड़फा के दुर्ग ने गुजरात से आए बघेलवंशी शासक व्याघ्रदेव को भी आकर्षित किया था। 1290 विक्रमी संवत् में व्याघ्रदेव ने यहाँ आकर मुकुंददेव चंद्रावत की कन्या सिंधुमती से विवाह किया और मड़फा दुर्ग बघेल शासकों के आधिपत्य में आ गया। वीरसिंह देव, वीरभान देव और रामचंद्र बघेल ने यहाँ पर शासन किया। बाद में बघेल शासकों ने अपनी राजघानी को रीवा स्थानांतरित कर दिया। इस तरह लगभग दो सौ वर्षों तक बघेलों के शासन की गवाही भी मड़फा दुर्ग के कण-कण में दिखती है। मड़फा के नजदीक ही गोंडरामपुर नामक एक गाँव है। यह गाँव गोंड शासकों की उपस्थिति को सँजोए हुए है। गोंड शासकों की वंशावली में रानी दुर्गावती का नाम भी आता है। मड़फा के दुर्ग ने रानी दुर्गावती की वीरता की गाथा को भी विस्मृत नहीं किया है।
मड़फा दुर्ग की जटिल संरचना का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ पर बाहरी लोगों का आना आज भी उतना ही कठिन है, जितना कि पुराने जमाने में रहा होगा। इसी कारण अठारहवीं शताब्दी के मध्य में टीफेन्थलर नामक एक डच पादरी ही शायद सबसे पहले यहाँ पहुँचा होगा और उसने ही यहाँ के बारे में, यहाँ की भौगोलिक संरचना और यहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन किया होगा, क्योंकि उसके पहले के किसी इतिहासकार ने इसका उल्लेख नहीं किया है। टीफेन्थलर लिखता है कि उस समय इसे मण्डेफा के नाम से जाना जाता था। सन् 1804 में कर्नल मेसलबैक ने रात्रि में यहाँ पर आक्रमण किया था, ताकि इस क्षेत्र को हिंसक खूँखार कब्जेदारों से खाली कराया जा सके। बाद में उसने भी इस क्षेत्र को छोड़ देना ही उचित समझा। तब से आज तक यह क्षेत्र कमोबेश उपेक्षित ही रहा है।
जनश्रुतियों में प्रचलित है कि यहाँ से गुजरते हुए एक जैन व्यापारी को अकूत संपदा प्राप्त हुई थी। इस धन का धर्मार्थ में उपयोग करते हुए मड़फा दुर्ग में उसने जैन मंदिरों का निर्माण कराया। दुर्ग में मठ की आकृति के एक ध्वंसावशेष के समीप ही जैन मंदिर भी बने हुए हैं। पंचरथ योजना के अनुरूप बने इन जैन मंदिरों का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त हो चुका है और गर्भगृह में कोई मूर्ति भी नहीं है। गर्भगृह से दूर एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है। शायद इस मूर्ति को गर्भगृह से निकालकर यहाँ रखा गया है। इस भग्न मूर्ति में तीन फीट लंबी और एक फीट चौड़ी पादपीठिका है, जिसमें शिलालेख है। संस्कृत में लिखे इस शिलालेख के अनुसार 1408 माघ सुदी 5 रविवार को मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई है। इस शिलालेख के अनुसार छीतम ने अपने पिता गोसल और माता सलप्रण, अपने पितामह धने तथा मातामही तोण का नामोल्लेख किया है और गोसल के पुत्र छीतम ने इस मूर्ति की स्थापना कराई है। पादपीठ में अंकित शिलालेख के आधार पर इस मूर्ति को तेरहवीं शताब्दी का माना जा सकता है। मड़फा दुर्ग में लगभग दो मीटर ऊँची ऋषभनाथ की एक अन्य प्रतिमा भी है। यह प्रतिमा काफी हद तक सुरक्षित है, जबकि कई अन्य मूर्तियाँ भग्न स्थिति में हैं।
मड़फा में तांडव नृत्य करते शिव की दुर्लभ मूर्ति भी है। इसमें शिव अपने हाथों में विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र लिए हुए हैं। पादतल में एक राक्षस पड़ा हुआ है। नए मंदिर का निर्माण कराकर इस प्रतिमा को सुरक्षित करने का प्रयास स्थानीय लोगों द्वारा किया गया है। शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का आगमन भी होता है। इस मंदिर से लगभग आठ सौ मीटर दूर एक आश्रम बना हुआ है। यहाँ पर जल-प्रबंधन का प्राचीन और दुर्लभ प्रयोग देखा जा सकता है। यहाँ पर चट्टान को काटकर एक कुंड जैसा बनाया गया है, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल इकट्ठा होता रहता है और वर्षा नहीं होने पर भी इसमें जल उपलब्ध रहता है। इस जलकुंड के समीप एक कच्चा तालाब भी है। ऐसी मान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने पर चर्मरोग नष्ट हो जाते हैं। जलकुंड और तालाब को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्ग में पर्याप्त प्रबंध किए गए थे, ताकि युद्ध आदि की स्थिति में दुर्ग के अंदर संसाधनों की कमी न पड़े। चंदेलों के आठ प्रमुख दुर्ग में से एक मड़फा भी है और यहाँ मिलने वाले भग्नावशेष इस दुर्ग के अजेय होने की गवाही स्वयं ही दे देते हैं। इन भग्नावशेषों के साथ जुड़ी अनेक रोचक कथाएँ लोक-जीवन में कब से हैं, इनका अनुमान लगाना भी अपने आप में एक रोचक और रोमांचकारी खोज से कम नहीं होगा।
मड़फा दुर्ग के किस्से आज भी हैं, मगर ये किस्से किसी भरत के नहीं; माण्डव्य, अथर्वा, वेदव्यास, च्यवन और चरक जैसे ऋषियों-महर्षियों के नहीं, वरन् आतंक और दहशत के पर्याय दस्युओं और अपराधियों के हैं। इन किस्सों के पीछे मड़फा का ऐतिहासिक, भौगोलिक और पौराणिक महत्त्व छिप गया है। यहाँ रात की बात तो दूर, दिन में भी जाने से लोगों को डर लगता है। यहाँ वेदव्यास को उपचार के लिए ले जाने वाले महर्षि अथर्वा के शिष्यों की संततियाँ नहीं, बल्कि लूटने और यहाँ तक कि जीवन का भी हरण कर लेने वाले आधुनिक भारत के क्रूर आक्रांताओं का विचरण होता रहता है। मड़फा दुर्ग की अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ धन के लालच की भेंट चढ़ गईं। धन के लालच में ही हाथी दरवाजा, मंदिरों के गर्भगृह और ऐतिहासिक निर्मितियाँ खोद डाली गईं। यहाँ के दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य को डकैतों और अपराधियों के छिपने के सुगम ठिकानों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। विकास के संकेत भी यहाँ देखे नहीं जा सकते। यह दुर्ग, जो एक समय में अजेय था, अजेय आज भी है, मगर विकास के लिए। आज भी मड़फा दुर्ग तक जाने के लिए पगडंडियाँ ही हैं, जो मानपुर, कुरहम या खमरिया गाँव से होकर जाती हैं। मड़फा दुर्ग की यह दयनीय त्रासदी है, जो अधूरेपन के अपने दर्द को देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा के समय से आज तक बखान रही है। कालंजर का दुर्ग पर्यटन के विश्व-स्तरीय मानचित्र पर है, मगर मड़फा आज भी उपेक्षित है। मड़फा दुर्ग को आज की कथाओं से उबारकर अतीत की कथाओं तक ले जाने के लिए प्रयास अपेक्षित हैं और इन प्रयासों के लिए मड़फा का अजेय दुर्ग आज विजित होने की प्रत्याशा में कृशकाय होकर भी खड़ा है।
डॉ. राहुल मिश्र



(नगरपालिका परिषद्, हटा, जनपद- दमोह, मध्यप्रदेश द्वारा प्रकाशित और डॉ. एम.एम. पांडे द्वारा संपादित बुंदेली दरसन- 2017 में प्रकाशित)